Tuesday, April 28, 2026
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ILLEGAL ENROLMENT MISUSE OF AADHAR CARD

नमस्कार, भारत मेरे साथ चैनल पर आप सभी का स्वागत है। यह नो फिल्टर में आज हम एक ऐसा मुद्दा उठाने जा रहे हैं जिसे नेशनल मीडिया भी उठाने से कतरा रहा है — भारत में अवैध एनरोलमेंट, आधार कार्ड का दुरुपयोग और अवैध प्रवासियों का प्रवेश कैसे और क्यों हो रहा है।

इन घटनाओं के कारण देश में कई समस्याएँ बढ़ रही हैं। इनमें से एक है धर्मांतरण और अवैध प्रवासियों के आने से होने वाले अवैध अतिक्रमण, जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। हम चर्चा करेंगे कि इसे कैसे रोका जा सकता है, क्यों रोकना आवश्यक है, और कौन लोग फर्जी आधार बनाकर इन्हें देश में प्रवेश दिलवाते हैं। ऐसे कौन से लोग हैं जो इन प्रवासियों के लिए रास्ता बनाते हैं — इन्हीं सवालों पर आज बात करेंगे।

आज मेरे साथ विशेष अतिथि हैं मीता बनर्जी जी, जो एक अधिवक्ता हैं और उन्होंने इस मामले पर एक पीआईएल दायर की है। यह एक संवेदनशील मुद्दा है जिसे उन्होंने अदालत तक पहुँचाया है। साथ ही हमारे साथ जुड़े हैं अजय कोल सरस्वत जी। इन दोनों से मैं जानना चाहूँगी कि इतनी बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी देश में कैसे प्रवेश कर रहे हैं, और क्या इसे गलती कहें या अपराध — इन सब सवालों के जवाब हमें आज इन्हीं से मिलेंगे।
सबसे पहले मैं मीता बनर्जी जी का स्वागत करती हूँ। मैम, आपका शो में स्वागत है। आपने इस मुद्दे को जिस तरह उठाया है, वह एक साहसिक और महत्वपूर्ण कदम है। आपने बिना पक्षपात के इस संवेदनशील विषय को अदालत तक पहुँचाया है, इसके लिए धन्यवाद।

अब मैं चाहूँगी कि आप दोनों से विस्तार से जानें — रोहिंग्या और अन्य अवैध प्रवासी किस तरह से देश में प्रवेश कर रहे हैं, किन राज्यों में यह समस्या अधिक दिख रही है, और किन कारणों से इस पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। दिल्ली, बंगाल, गुजरात और असम जैसे राज्यों में यह समस्या बार-बार सामने आ रही है। इनकी संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि हटाने या नियंत्रित करने में भी कठिनाइयाँ आ रही हैं।

आइए अब इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा शुरू करते हैं और जानते हैं कि कानून क्या कहता है, प्रशासनिक चुनौतियाँ क्या हैं, और नागरिकों के लिए इससे जुड़ी क्या चिंताएँ हैं।

भारत में रोहिंग्या और अन्य अवैध प्रवासी फर्जी आधार व दस्तावेज़ बनवाकर किस प्रक्रिया से देश में प्रवेश कर रहे हैं, और इन्हें प्रवेश दिलाने वाले नेटवर्क या लोग कौन हैं?
मेरा नाम एडवोकेट नीता बनर्जी है। मैं हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करती हूँ। जिस केस की हम चर्चा कर रहे हैं, वह मेरी क्लाइंट का केस है। सुरक्षा कारणों से मैं क्लाइंट का नाम सार्वजनिक नहीं कर रही हूँ।

इस केस में मुख्य बिंदु यह है कि अवैध प्रवासी कौन हैं और वे कैसे हमारे देश में रहते‑सहते वैध दस्तावेज़ हासिल कर लेते हैं। हमेशा ऐसा नहीं होता कि ये लोग अवैध तरीके से ही आते हैं; कई बार वे वैध पासपोर्ट और वीज़ा (जैसे स्टूडेंट वीज़ा) लेकर भारत आते हैं। मेरे केस में भी पिटिशनर का पति स्टूडेंट वीज़ा पर पढ़ने आया था और बाद में वहीं रह गया — वह बांग्लादेशी नागरिक है और यहाँ पढ़ाई भी की।

हमारे शिक्षा‑प्रणाली और दस्तावेज़ी मानकों में एक विशेष बात है: जिनका जन्म 1990 से पहले हुआ है, उनके लिए जन्म प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में माध्यमिक बोर्ड का एडमिट कार्ड और अन्य शैक्षिक दस्तावेज़ पहचान के प्रमुख साधन बन जाते हैं। आप सोचिए — बाहर से आए किसी व्यक्ति का एडमिट कार्ड और मेरे जैसे किसी भारतीय का एडमिट कार्ड दिखने में समान हो सकता है; दोनों में अंतर पहचानना मुश्किल हो जाता है।

यहाँ एक बड़ा कारण भ्रष्टाचार और स्थानीय नेटवर्क भी है: कुछ भ्रष्ट राजनेता जिन्हें वोट चाहिए, कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारी जिन्हें पैसे चाहिए, और कुछ भ्रष्ट नौकरशाह — इन सबका एक रैकेट बन जाता है। हर किसी पर आरोप नहीं लगा रही, पर ऐसे रैकेट मौजूद हैं। मेरे पिटिशनर के मामले में, उस व्यक्ति ने स्थानीय राजनीतिक समर्थन और प्रभाव के सहारे अपना आधार कार्ड, वोटर कार्ड और अन्य दस्तावेज़ बनवाए। इन दस्तावेज़ों में कोई स्पष्ट नकलीपन नहीं दिखता — वे उतने ही “जेनुइन” लगते हैं जितने किसी भारतीय के दस्तावेज़।

और चौंकाने वाली बात यह है कि उस व्यक्ति के पास बांग्लादेश का नेशनल आईडी और पासपोर्ट भी था; साथ ही उसके पास बांग्लादेश की किसी सरकारी एजेंसी में नौकरी का प्रमाण भी था। फिर भी उसे भारत में वैध दस्तावेज़ मिल गए। मैंने यह मामला हाई कोर्ट में रिट पिटीशन के रूप में दायर किया है — मामला WPA 7508 of 2026 के रूप में दर्ज है। मैं सुरक्षा कारणों से पिटिशनर का नाम साझा नहीं कर रही।

यह मामला एक लैंड डिस्प्यूट से जुड़ा हुआ था, और जब पिटिशनर ने अपने पति के दस्तावेज़ प्रस्तुत किए तो पता चला कि वे सभी भारतीय दस्तावेज़ हैं। हमने उनसे पूछा कि ये दस्तावेज़ कैसे बने — कई बांग्लादेशी नागरिकों के पास ऐसे दस्तावेज़ पाए जाते हैं। जब हमने यह सत्यापन किया तो सामने आया कि उस व्यक्ति ने 25/04/2024 और 29/04/2024 को एफआरओ, मिनिस्ट्री, होम मिनिस्टर और पीएमओ को ईमेल भी किए थे ; मुझे भी उन ईमेल्स की सीसी मिली है। मेरे पास सारे दस्तावेज़ उपलब्ध हैं और मैंने पिटीशन भी साझा की है।

एक वकील का काम यह है कि वह अपने मुवक्किल का पक्ष रखे, पर इसका मतलब यह नहीं कि वकील झूठ बोले। कानून में अदालत के सामने झूठ बोलना दंडनीय है — यह अपराध है और सेक्शन 340 के तहत दंडनीय हो सकता है। जब हमने मुवक्किल को यह समझाया कि जो कुछ हुआ वह अवैध है, तो उन्होंने अंततः यह स्वीकार किया और अपने पति को भी बताया। पति उस समय बांग्लादेश में था — यही इस केस का ट्विस्ट है।

यह भी बताना ज़रूरी है कि दोनों पक्ष धर्म के आधार पर मुस्लिम हैं; पर मुद्दा धर्म नहीं, दस्तावेज़ी सत्यता और कानूनी स्थिति है। अब हम इस केस को अदालत में आगे ले जा रहे हैं ताकि सत्यता और जवाबदेही सामने आ सके।

इन अवैध प्रवासियों के लिए फर्जी आधार, वोटर कार्ड और अन्य पहचान पत्र कौन बनवाता है, और यह दस्तावेज़ीकरण किन नेटवर्कों या प्रक्रियाओं के माध्यम से संभव होता है?
यहाँ गंभीर आरोप सामने आए हैं कि अवैध दस्तावेज़ बनाने का एक सुनियोजित रैकेट सक्रिय है। पिटिशनर का कहना है कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में स्थानीय पुलिस, भ्रष्ट राजनीतिक तत्व और कुछ वकीलों के बीच एक गहरा नेटवर्क मौजूद है, जो अवैध प्रवासियों को संरक्षण देता है और उन्हें भारतीय पहचान पत्र उपलब्ध कराता है।

पिटिशनर ने विशेष रूप से महेशरा थाना का उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि जब उन्होंने अधिकारियों को अवैध रूप से रह रहे लोगों की जानकारी दी, तो संबंधित अधिकारी ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसके बजाय, उन लोगों को भागने का अवसर मिल गया। बाद में, सात में से दो व्यक्तियों को पेट्रापोल सीमा पर गिरफ्तार किया गया। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि स्थानीय स्तर पर कानून‑व्यवस्था को कमजोर करने वाले तत्व मौजूद हैं।

पिटिशनर का आरोप है कि कुछ वकील भी इस नेटवर्क का हिस्सा हो सकते हैं। वे थानों में मौजूद रहते हैं और ऐसे मामलों में कानूनी प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे यह संदेह गहराता है कि कानूनी प्रक्रिया का उपयोग भी अवैध प्रवासियों को बचाने के लिए किया जा रहा है।

उनका तर्क है कि इस तरह के संरक्षण और फर्जी दस्तावेज़ीकरण से न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि देश की जनसंख्या संरचना (demography) भी प्रभावित हो रही है। यह स्थिति सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक तनाव को जन्म दे सकती है।

पिटिशनर ने अदालत में यह मामला उठाया है और उच्च न्यायालय को सूचित किया है ताकि इस पूरे नेटवर्क की जाँच हो सके और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सके। उनका कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति या एक परिवार का मामला नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक समस्या है जो देश की अखंडता और सुरक्षा से जुड़ी हुई है।

इस केस से यह स्पष्ट होता है कि अवैध प्रवासियों का मुद्दा केवल सीमा पार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण के कारण यह समस्या और भी गहरी हो जाती है। अदालत में यह मामला अब एक सिस्टमेटिक फेल्योर और संस्थागत भ्रष्टाचार की जाँच का अवसर बन सकता है।

फर्जी आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्र अवैध प्रवासियों को दिलाने वाला यह नेटवर्क कैसे काम करता है, और इसमें कौन‑कौन से स्थानीय तंत्र या लोग शामिल होते हैं?
यह फर्जी नहीं है, मैडम — सारे आधार असली हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि आधार किसका बना? आधार तो केवल भारतीय नागरिकों के लिए बनता है; बांग्लादेशी नागरिक का आधार नहीं बन सकता और न ही वह वोटर‑कार्ड का हकदार हो सकता है। यही मूल अंतर है जिसे समझना ज़रूरी है।

समस्या यह है कि इन दस्तावेज़ों को बनाने में कोई सतही धोखाधड़ी दिखाई नहीं देती। वे वैध प्रक्रियाओं के तहत ही बनवाए गए हैं — जैसे कि हमने और आपने अपने दस्तावेज़ बनवाए हैं। व्यक्ति ने वही प्रक्रिया अपनाई, वही फॉर्म भरे, वही बायोमेट्रिक दिए। लेकिन असली दोष उन अधिकारियों और तंत्र का है जिन्होंने बिना उचित जांच‑पड़ताल के दस्तावेज़ जारी कर दिए।

यहाँ जिम्मेदारी कई स्तरों पर बनती है:

पुलिस अधिकारी जो जानते हुए भी कार्रवाई नहीं करते।

नौकरशाह और आधार अथॉरिटी जो दस्तावेज़ों की सत्यता की जाँच किए बिना उन्हें मंज़ूरी दे देते हैं।

वकील और नोटरी जो शपथ‑पत्रों (एफिडेविट) पर हस्ताक्षर कर देते हैं, यह दिखाते हुए कि वे व्यक्ति को पहचानते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने कोई पहचान नहीं की होती।

जब कोई वकील किसी व्यक्ति की पहचान बताकर साइन करता है, तो उसका मतलब यह होना चाहिए कि उसने व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से पहचाना है। लेकिन यदि यह केवल ₹500 लेकर औपचारिकता पूरी कर दी गई हो, तो यह स्पष्ट रूप से गलत है और कानून की भावना के खिलाफ है।

इस तरह से दस्तावेज़ “फर्जी” नहीं दिखते, बल्कि उतने ही असली लगते हैं जितने किसी भारतीय नागरिक के। यही सबसे बड़ा खतरा है — क्योंकि यह सिस्टम की विफलता और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। असली अपराधी वह व्यक्ति नहीं है जिसने प्रक्रिया अपनाई, बल्कि वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाए बिना उसे वैधता प्रदान कर दी।

पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों और फर्जी दस्तावेज़ीकरण से जुड़े मामलों पर न्यायपालिका (Judiciary) का रुख कैसा रहा है, और ऐसे संवेदनशील मुद्दों को अदालत किस दृष्टिकोण से देखती है?
जुडिशरी के पास तो मामला लाना ही पड़ता है। पहली बात यह है कि जब केस अदालत में जाता है तो हमारा कानून बिल्कुल स्पष्ट है — भारतीय कानून का सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति दोषी सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है ( Presumed to be innocent, not presumed to be guilty) ।

इसलिए अदालत सबसे पहले पुलिस से रिपोर्ट मंगवाती है। न्यायपालिका उसी रिपोर्ट को देखकर अपना निर्णय देती है। लेकिन समस्या तब होती है जब रिपोर्ट तैयार करने वाले अधिकारी ही भ्रष्ट हों। जैसा कि मैंने पहले कहा, महेशरा थाना में तैनात एसआई अयन का नाम सामने आया है, जिन पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

हाल ही में भी आपने देखा होगा कि शांतनु सिन्हा विश्वास, जो डीजीपी रहे हैं, उनके घर पर छापेमारी हुई थी और उन पर भी अवैध गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोप लगे। इसका मतलब यह है कि पुलिस का एक बड़ा नेटवर्क है जो अपराधियों के साथ जुड़ा हुआ है। सामान्यतः पुलिस अपराधियों का दुश्मन होती है, लेकिन यहाँ स्थिति उलट है — पुलिस अपराधियों की दोस्त बन चुकी है। जितना बड़ा अपराधी, उतना ही मजबूत उसका पुलिस से संबंध।

आप देखिए, एक SHO (थाना प्रभारी) की तनख्वाह लगभग एक से डेढ़ लाख रुपये होती है। लेकिन उनके पास कई iPhone, महंगी घड़ियाँ, कई गाड़ियाँ और संपत्तियाँ होती हैं। यह सब उनकी आय से कहीं अधिक है। सवाल यह है कि इतनी संपत्ति वे कैसे जुटा सकते हैं? अगर हम यह सवाल नहीं उठाते, तो असली अपराधी हम ही हैं — क्योंकि हम आँखें होते हुए भी अंधे बने रहते हैं।

मैंने आपको सारे दस्तावेज़ दिए हैं। उनमें यह भी दर्ज है कि संबंधित व्यक्ति ने ईमेल के माध्यम से एफआरओ, मंत्रालय, गृह मंत्रालय और पीएमओ तक अपनी स्थिति बताई थी। उसने यह भी लिखा कि वह अपने परिचित बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कराने को तैयार है। लेकिन केस अभी तक पूरी तरह से उठ नहीं पाया।

अब 27 तारीख को केस की सुनवाई है। हम उम्मीद करते हैं कि अदालत इस मामले को गंभीरता से उठाएगी। अगर न्यायपालिका ने ठोस कदम उठाए तो शायद हम बच जाएँगे, वरना हमें भी पश्चिम बंगाल छोड़ने की नौबत आ सकती है।

इस विषय का पूरा वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए भारत मेरे साथ चैनल के लिंक को क्लिक करें और उसे लाइक, शेयर, सब्सक्राइब और कमैंट्स जरूर करें

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