Friday, April 24, 2026
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डॉ. श्यामला, घरेलू स्तर पर वेस्ट मैनेजमेंट के लिए आप सबसे प्रभावी कदम क्या सुझाएँंगी और एक RWA/कम्युनिटी इन्हें लागू करने के लिए क्या-क्या व्यावहारिक कदम उठा सकती है।

नमस्कार और हैप्पी अर्थ डे — आप सभी का स्वागत है। इसे हम शुभ पृथ्वी दिवस भी कह सकते हैं। वास्तव में देखा जाए तो हर दिन ही पृथ्वी दिवस है, क्योंकि हमारा जीवन, हमारी साँसें और हमारी पूरी सभ्यता पृथ्वी पर ही निर्भर है। फिर भी परंपरा के अनुसार कुछ विशेष दिन मनाए जाते हैं ताकि हम सामूहिक रूप से अपनी ज़िम्मेदारी को याद करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर संदेश छोड़ सकें।

जैसा मैंने पहले भी बताया था, जब पर्यावरण की चर्चा होती थी तो ज़्यादातर लोग नीतियों, नियमों और सरकारी अधिनियमों पर ध्यान केंद्रित करते थे — जैसे संसद के कानून, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के नियम, या अन्य नियामक संस्थाएँ। लेकिन यह सब केवल कागज़ी और प्रशासनिक स्तर पर सीमित था। आम जनता के बीच जागरूकता बहुत कम थी।

1970 के दशक में, जब दुनिया भर में औद्योगिकीकरण तेज़ी से बढ़ रहा था और प्रदूषण के दुष्प्रभाव सामने आने लगे थे, तब लोगों ने महसूस किया कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। ज़रूरी है कि नागरिक स्वयं आगे आएँ और प्रकृति को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएँ। इसी सोच से अमेरिका में पहली बार Earth Day मनाया गया। यह एक जन आंदोलन था, जिसमें युवाओं ने नेतृत्व किया और समाज को यह संदेश दिया कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है।

तब से यह दिन एक एक्शन‑ओरिएंटेड डे बन गया। दुनिया भर में इसे मनाया जाने लगा और हर साल 22 अप्रैल को लोग पर्यावरण के लिए कुछ न कुछ करते हैं — चाहे वह वृक्षारोपण हो, सफाई अभियान हो, या जागरूकता कार्यक्रम। यह दिन केवल प्रतीक नहीं है, बल्कि एक प्रेरणा है कि हम अपनी आदतों और जीवनशैली में बदलाव लाएँ।

भारत में भी पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। स्कूलों, कॉलेजों, आरडब्ल्यूए और सामाजिक संगठनों द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन असली महत्व तभी है जब हम इसे केवल एक दिन तक सीमित न रखें। मेरा मानना है कि अर्थ डे पर जो काम किए जाते हैं — जैसे प्लास्टिक कम करना, पानी बचाना, वेस्ट मैनेजमेंट करना, पेड़ लगाना — इन्हें रोज़ाना जारी रखना चाहिए। तभी यह पृथ्वी के लिए सचमुच लाभकारी होगा।

इस तरह अर्थ डे हमें यह याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारी साझा धरोहर है। इसे बचाना केवल आज की ज़रूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।

सहभागिता स्कीम क्या है और हमारी सोसाइटी/आरडब्ल्यूए कम संसाधन में इसे जमीन पर कैसे लागू कर सकती है — शुरुआती कदम, MCD से मिलने वाला समर्थन और किसी सफल मॉडल के व्यावहारिक उदाहरण बताइए

बहुत अच्छा प्रश्न है। जैसा कि आप जानते हैं, हम एयर पॉल्यूशन की बात कर रहे थे। रिसर्च से यह पाया गया है कि लगभग 11–12% वायु प्रदूषण का कारण खुले में कूड़े और कचरे को जलाना है।

इसके अलावा, दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा और गाज़ियाबाद जैसी एनसीआर की शहरों से जो कचरा इकट्ठा होता है, उसे बड़े-बड़े लैंडफिल और डंपसाइट्स पर फेंक दिया जाता है। जब बिना अलग किए गए मिश्रित कचरे को इस तरह डंप किया जाता है, तो उसमें मौजूद गीला कचरा (wet waste) मीथेन गैस उत्पन्न करता है। यह मीथेन अक्सर स्वतः आग पकड़ लेता है और उसमें मौजूद प्लास्टिक, बैटरियां, पेन और अन्य खतरनाक चीजें जलने लगती हैं। इससे भी वायु प्रदूषण बढ़ता है।

तीसरा कारण ग्रीनहाउस गैसें हैं—जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि। ये गैसें जलवायु परिवर्तन का कारण बनती हैं। गर्मी बढ़ने पर और वाहनों से निकलने वाली गैसों के साथ मिलकर ट्रोपोस्फेरिक ओज़ोन बनता है, जो प्रदूषण को और बढ़ाता है।

अब सवाल यह है कि कचरे के क्षेत्र में हम क्या कर सकते हैं?

दिल्ली नगर निगम (MCD) ने सहभागिता योजना शुरू की है। विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि दिल्ली में उत्पन्न होने वाले कचरे का 60% हिस्सा गीला और बायोडिग्रेडेबल होता है। यदि इसे स्रोत पर ही अलग नहीं किया गया तो यह डंपसाइट पर जाकर मीथेन बनाता है और आग लगने का कारण बनता है।

इसलिए MCD ने सभी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज़, RWAs, स्कूलों, बड़े होटल-रेस्टोरेंट्स और ऑफिस कॉम्प्लेक्स (जहाँ 20,000 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्र है और 100 किलो से अधिक कचरा उत्पन्न होता है) को Bulk Waste Generators घोषित किया है। इन्हें कम से कम गीला और सूखा कचरा अलग करना अनिवार्य किया गया है।

गीले कचरे का समाधान:60% गीला कचरा कॉलोनी या परिसर के भीतर ही कम्पोस्टिंग या बायोमिथेनेशन (जैसे बायोगैस) के माध्यम से निपटाना चाहिए। इसके लिए एरोबिन्स, गाया, डेली डंप खंबा जैसे मानक कम्पोस्टर लगाए जा सकते हैं। इससे कचरे को शहर भर में ढोने की ज़रूरत नहीं पड़ती और वही कचरा खाद और उर्वरक में बदल जाता है।

उदाहरण – सीआर पार्क (E Block):हमारे RWA में 500 से अधिक घर हैं। हमने MCD और NGOs (Indian Pollution Control Association और Niramaya Environment Trust) की मदद से पार्कों में प्लेटफॉर्म बनाकर एरोबिन्स लगाए। वहाँ गीले कचरे को अलग करके सॉ-डस्ट और कोकोपीट के साथ मिलाकर कम्पोस्ट बनाया जाता है। कम्पोस्टिंग से कचरे का वजन पाँचवाँ हिस्सा रह जाता है और हमें पौष्टिक खाद मिलती है, जिसे हम पार्कों और निवासियों के बगीचों में इस्तेमाल करते हैं।

सूखा कचरा साफ रहता है और उसे रिसाइक्लर को भेजा जाता है। इससे कचरा उठाने वाले को अतिरिक्त आय भी होती है। केवल 40–50 किलो विशेष कचरा (जैसे सैनिटरी नैपकिन, डायपर, कुछ रसायन) ही ढलाव में जाता है। बाकी लगभग 250 किलो कचरा कॉलोनी के भीतर ही निपट जाता है। इसी कारण हमें Zero Waste Certificate और सहभागिता प्रमाणपत्र मिला है।

MCD के प्रोत्साहन:

10% इंसेंटिव (जैसे सड़क और पार्कों का सुधार)

ट्रीटेड पानी का उपयोग पार्कों में

प्रॉपर्टी टैक्स में छूट

कोई जुर्माना या पेनल्टी नहीं

प्रश्न 1: आम नागरिकों को पर्यावरण से जुड़ने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकता है ?
उत्तर:
जब नागरिकों को यह महसूस होता है कि उनके प्रयासों से उन्हें भी लाभ मिलेगा—जैसे पार्कों में हरियाली, स्वच्छता और मनोरंजन स्थल—तो वे स्वयं जुड़ने लगते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

प्रश्न 2: पौधारोपण अभियान को सफल बनाने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
पौधों को पर्याप्त धूप, पानी और पोषण (जैसे कम्पोस्ट) मिलना चाहिए।

सड़क किनारे या कॉलोनी में पौधारोपण करते समय पर्याप्त जगह और ट्री गार्ड का इस्तेमाल ज़रूरी है।

गर्मियों में पानी की व्यवस्था के लिए एसी कंडेन्सेट या आरओ का अतिरिक्त पानी उपयोग किया जा सकता है।

नर्सरी से थोड़े बड़े पौधे लगाने से उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।

प्रश्न 3: कम्पोस्टिंग और वेस्ट वाटर का उपयोग पौधों की देखभाल में कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:
कम्पोस्ट से पौधों को पोषण मिलता है और एसी/आरओ से निकलने वाला पानी गर्मियों में सिंचाई के लिए उपयोगी होता है। इस तरह घरेलू संसाधनों का पुनः उपयोग कर पौधों की देखभाल आसान हो जाती है।

प्रश्न 4: इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-Waste) को सही तरीके से कैसे रिसाइकल किया जाए?
ई-वेस्ट केवल अधिकृत रिसाइक्लरों को ही देना चाहिए, जिन्हें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से प्रमाणपत्र मिला हो।

कबाड़ी वाले को इलेक्ट्रॉनिक सामान न दें जब तक वह अधिकृत न हो।

ई-वेस्ट में हानिकारक पदार्थ (जैसे हैवी मेटल्स, फ्लेम रिटार्डेंट्स) होते हैं, इसलिए इसे वैज्ञानिक तरीके से ही रिसाइकल करना ज़रूरी है।

प्रश्न 5: सामान्य सूखा कचरा (Dry Waste) जैसे पेपर, प्लास्टिक, ग्लास, मेटल आदि का क्या करना चाहिए?
उत्तर:
इन्हें सामान्य कबाड़ी या वेस्ट कलेक्टर को दिया जा सकता है क्योंकि ये सुरक्षित रूप से रिसाइकल हो जाते हैं। लेकिन सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से बचना चाहिए और स्टील, ग्लास जैसे टिकाऊ विकल्पों का उपयोग करना बेहतर है।

प्रश्न 6: घर पर सुरक्षित रिसाइक्लिंग के कौन से उदाहरण अपनाए जा सकते हैं?
उत्तर : पूजा के फूलों को सुखाकर उनसे अगरबत्ती बनाना, बॉक्स और बोतलों का पुनः उपयोग करना, और टिकाऊ सामग्रियों (ग्लास, स्टील) को बार-बार इस्तेमाल करना ऐसे उपाय हैं जो घर पर ही सुरक्षित रूप से किए जा सकते हैं।

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