Monday, June 1, 2026
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जयचंद, ”अबकी बार नया चोला पहनकर आये हैं , आपने बाबर को निमंत्रण दिया है”

नमस्कार, भारत मेरे साथ चैनल पर आप सभी का स्वागत है।

1990 के कुछ पुराने दस्तावेज़ ढूँढते‑ढूँढते मुझे एक डायरी मिली। उस डायरी में मेरे दादाजी श्री द्वारकानाथ सप्रू जी के हाथ से लिखी हुई चिट्ठियाँ हैं। वे उस समय लगातार देश के नेताओं को पत्र लिखते थे — हिंदुओं के खिलाफ चल रहे अजीब और खतरनाक आंदोलनों के विरोध में।

इन चिट्ठियों में उनकी आवाज़ है, उनका आक्रोश है, और उनका देशभक्ति से भरा हुआ मन है। कुछ पन्ने मुझे मिले हैं, जिनमें से एक लेख मैंने पहले आज तक के ब्लॉग पोर्टल पर भी प्रकाशित करवाया था।

मेरे दादाजी इन पत्रों को किस्तों में लिखते थे, मानो वे एक किताब तैयार करना चाहते हों। लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे इसे पुस्तक का रूप नहीं दे पाए। अब मेरा प्रयास है कि मैं इन चिट्ठियों को आपके सामने पढ़ूँ और रिकॉर्ड करूँ, ताकि यह केवल मेरे चैनल तक ही सीमित न रहें, बल्कि अन्य मंचों तक भी पहुँचें।

किस्त नंबर 1 — चिट्ठी दिनांक 5 नवंबर 1990
यह वह साल था जब कश्मीरी हिंदुओं पर सबसे बड़ी त्रासदी आई। उन्हें घरों से निकाला गया, मारा गया, सताया गया और मजबूर किया गया कि वे अपनी आस्था छोड़ दें।

मेरे दादाजी ने उस समय 165‑B7 शक्ति नगर, जम्मू से यह पत्र लिखा।

“श्रीमान जयचंद जी, नमस्ते।
बहुत दिनों बाद आप भारत माता की धरती पर उतरे। आपका दुखी तथा भारी दिल से स्वागत है।
पहले जन्म में आपने बाबर को निमंत्रित करके बाबरी मस्जिद बनवाई और बहुसंख्यक जनता की छाती पर मूंग डलवाया।
अबकी बार आप नया चोला पहनकर आए हैं। बाहरी आवरण निरपेक्षता का है, परंतु करतूत इतने काले हैं कि उनकी घिनौनी सूरत देखना नहीं चाहते।
आज आपकी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में लोग कहते हैं — ‘बाबर बनके आए थे मंदिर‑मस्जिद बनाए थे, बाबर बनके आएंगे मंदिर‑मस्जिद बनाएंगे।’
इन उत्तेजित नारों को सुनकर भी आप समय की मांग को नहीं समझते। बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को लेकर भारतीयों के खून की होली खेल रहे हो।
क्या भारतीय राष्ट्र आपको माफ कर सकता है?”

यह पत्र अपने आप में उस दौर की राजनीति और समाज की स्थिति को उजागर करता है। आप समझ सकते हैं कि 5 नवंबर 1990 में किसकी सरकार थी और “जयचंद” का नाम किस नेता के लिए प्रयोग किया गया। हम चैनल पर किसी का नाम नहीं लेंगे, केवल इन चिट्ठियों को आपके सामने रखेंगे।

ऐसी कई चिट्ठियाँ मेरे पास हैं, जिनमें मेरे दादाजी नेताओं को लगातार ललकारते रहे कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी एक पक्ष के विरुद्ध और दूसरे पक्ष के पक्ष में नहीं होना चाहिए।

उनका मानना था कि नेताओं में भी देशभक्ति की लहर होनी चाहिए, सबके प्रति समानता का भाव होना चाहिए। जिस सेक्युलरिज़्म को आज हम अजीब तरह से परिभाषित करते हैं, उस समय के लोग वास्तव में सच्चे सेक्युलर थे — हर धर्म का सम्मान करते थे और देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहते थे।

समापन
आगे आने वाली किस्तों में मैं आपको और चिट्ठियाँ सुनाऊँगा, पढ़कर बताऊँगा कि किस तारीख को क्या लिखा गया था।

देखते रहिए भारत मेरे साथ और चैनल को ज़रूर सब्सक्राइब कीजिए।

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