क्या ममता बनर्जी की मासिक आर्थिक सहायता (₹2,000–₹10,000) बंगाल की महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है?
ममता बनर्जी को एक मज़बूत अपोज़िशन लीडर माना जाता है। उन्होंने ग्रासरूट स्तर से संघर्ष करके अपनी पहचान बनाई है और राजनीति में अपनी जगह बनाई है। लेकिन किसी राज्य को चलाने के लिए केवल ₹1500 या ₹2000 जैसी मासिक सहायता योजनाएँ पर्याप्त नहीं होतीं। यह राशि सीमित वर्ग तक पहुँचती है, जबकि मध्यवर्गीय और शिक्षित महिलाएँ, जो अपनी मेहनत से ₹25,000–₹50,000 तक कमा सकती हैं, उनके लिए यह “खैरात” आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाली प्रतीत होती है।
असल समस्या यह है कि यह पैसा भी जनता से ही लिया जाता है और राज्य पर भारी कर्ज़ का बोझ बढ़ता जाता है। वेस्ट बंगाल में कृषि, उद्योग और आईटी सेक्टर की स्थिति कमजोर है। शिक्षा व्यवस्था भी भ्रष्टाचार से प्रभावित है — शिक्षक नौकरियों में घूसखोरी, योग्य उम्मीदवारों का न्याय के लिए सड़क पर बैठना, और डॉक्टर जैसी पेशेवर महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर गंभीर अपराध होना, जिनके सबूत तक नष्ट कर दिए जाते हैं। यह सब राज्य की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
महिला अपराधों के मामलों में स्थिति और भी चिंताजनक है। कामदुनी जैसी घटनाएँ इसका उदाहरण हैं, जहाँ एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और 10 आरोपियों में से 9 बरी कर दिए गए। न्यायिक प्रक्रिया को जानबूझकर हाई कोर्ट तक ले जाकर कमजोर किया गया। हाई कोर्ट, जो फैक्ट‑फाइंडिंग कोर्ट नहीं है, वहाँ केस ले जाकर न्याय को टालने और कमजोर करने की कोशिश की गई। कानून को एक “इंस्ट्रूमेंट” बनाकर खेला जा रहा है। जूनियर और फर्स्ट जनरेशन एडवोकेट्स, खासकर महिला वकीलों को बोलने तक नहीं दिया जाता, जबकि राजनीतिक प्रभाव वाले लोग कोर्ट में चिल्ला सकते हैं और उन्हें कोई नहीं रोकता।
यह भेदभाव और अन्याय केवल मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें वकीलों, जजों और राजनीतिक दलों की भी भूमिका है। सवाल यह है कि जब देश का संविधान “बाय द पीपल, फॉर द पीपल” कहता है, तो सरकारी कर्मचारियों और न्यायपालिका को “क्राउन प्रिविलेज” क्यों दिया जाता है। यह विशेषाधिकार जनता के विश्वास को कमजोर करता है और लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ जाता है।
इतिहास गवाह है कि जो लोग क्रांति लाने की कोशिश करते हैं, उन्हें अक्सर कुचल दिया जाता है — चाहे वह भगत सिंह हों या नेताजी सुभाष चंद्र बोस। आज भी जो लोग बदलाव की आवाज़ उठाते हैं, उन्हें दबा दिया जाता है।
इसलिए ज़रूरी है कि न्यायपालिका पारदर्शी बने। हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट में लाइव स्ट्रीमिंग हो, ताकि जनता देख सके कि न्याय कैसे दिया जा रहा है। हर नागरिक को बोलने का अधिकार मिले और न्यायिक प्रक्रिया में समानता सुनिश्चित हो। जब तक यह नहीं होगा, तब तक वेस्ट बंगाल जैसी घटनाएँ दोहराई जाती रहेंगी और जनता का विश्वास टूटता रहेगा। इस पूरे विषय को जानने समझने और देखने के लिए नीचे दिए गए भारत मेरे साथ चैनल के लिंक को क्लिक करें और चैनल को लाइक, शेयर सब्सक्राइब और अपनी विचार कमैंट्स में जरूर करें|




