Friday, April 24, 2026
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मां बगलामुखी की जयंती (24 अप्रैल) के उपलक्ष्य में, उनके स्वरूप और महत्व पर विस्तृत चर्चा क्यों आवश्यक मानी जाती है, और इस दिन विशेष रूप से उनकी उपासना का क्या महत्व है?

मां बगलामुखी का ध्यान
मैं एक छोटे से ध्यान से आरंभ करता हूं:
” जीवाग्र मादा करे देवी मामे शत्रु परिपयती गदा विघाते दक्षिण पीताम्बरायाम दुभजाम नमामि”

दो हाथों वाली भगवती हैं। बाएँ हाथ से शत्रु की जीभ पकड़ती हैं और दाएँ हाथ से गदा से प्रहार करती हैं। ऐसे पीताम्बरा भगवती को हम नमस्कार करते हैं और जगत के कल्याण हेतु उनसे प्रार्थना करते हैं।

उत्पत्ति की कथा
भगवती बगलामुखी का स्वरूप विकट स्थितियों में उत्पन्न हुआ। जब संपूर्ण जगत जल में डूबा था और प्रलयंकारी तूफान आया, तब भगवान विष्णु ने सृष्टि के संरक्षण हेतु भगवती का ध्यान किया। हरिद्रा (हल्दी) के रंग का एक सरोवर बना और उससे भगवती प्रकट हुईं। उन्होंने उस महावात को शांत किया और सृष्टि की रक्षा की।

मदनासुर की कथा
ब्रह्मांड पुराण में मदनासुर की कथा आती है। उसने कठोर तपस्या से वर प्राप्त किया और देवताओं को पीड़ा दी। तब मां बगलामुखी ने उसकी जीभ पकड़कर स्तंभित किया और गदा से प्रहार कर उसका अहंकार नष्ट किया।

असुर का संकेत
असुर केवल बाहरी शक्ति नहीं है, बल्कि हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्ति है—दूसरों को पीड़ा देना, अहंकार में चूर होकर किसी को तुच्छ समझना। मां बगलामुखी इन प्रवृत्तियों को स्तंभित करती हैं।

विशेषता और गुण
मां बगलामुखी स्तंभन की देवी हैं।

वे अज्ञान, शत्रु भाव और अशुभ प्रवृत्तियों को रोकती हैं।

वे वाणी की देवी हैं और वाक् सिद्धि देती हैं।

उनका रंग पीत है, जो मंगलकारी माना जाता है।

वे श्रीकुल और कालिकुल दोनों में पूजित हैं।

कश्मीर शैव दर्शन में भी बगलामुखी के स्वरूप का उल्लेख मिलता है।

साधना का महत्व
मां बगलामुखी की साधना से शत्रु की वाणी स्तंभित होती है, अहंकार नष्ट होता है और भक्त को वाक् सिद्धि प्राप्त होती है। वे भक्त के भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर कल्याण करती हैं।

❓ मां बगलामुखी को पीतांबरी क्यों कहा जाता है, जबकि अन्य देवियों का रंग लाल माना जाता है और उन्हें लाल चुनरी या लाल वस्त्र अर्पित किए जाते हैं?

मां बगलामुखी को पीतांबरी कहा जाता है। इन्हें पीत पुष्प और पीत वस्त्र अति प्रिय हैं। कुछ तंत्र शास्त्रों में इन्हें पीत पुष्पा भी कहा गया है। ललिता सहस्रनाम में उल्लेख आता है: “बंधूककुसुमप्रख्या बाला लीला विनोदिनी” — अर्थात् बंधूक पुष्प जैसी कांति वाली। यह कांति पीतांबरा की है।

ये नारायण की शक्ति हैं। नारायण स्वयं पीतांबर धारण करते हैं और मां बगलामुखी भी पीतांबर धारण करती हैं। शक्ति का अर्थ ऊर्जा है।

‘वग’ शब्द का अर्थ
‘बगला’ शब्द ‘वग’ से बना है। ‘वग’ का अर्थ है लगाम। जैसे जबड़े पर लगाम लगाई जाए तो वाणी नियंत्रित हो जाती है। बगलामुखी का कार्य है वाणी पर लगाम लगाना। इसलिए बगलामुखी साधकों को मौन साधना करनी चाहिए। मौन से शक्ति का ग्रहण अधिक होता है और साधक के भीतर रूपांतरण होता है।

पहले गायों को जब अधिक कंकड़ या अनुपयुक्त वस्तुएँ खाने से रोकना होता था तो उनके मुख पर जालीनुमा लगाम लगाई जाती थी। उसी प्रकार साधक की वाणी पर संयम आवश्यक है। यदि वाणी संयमित न हो तो असुर भाव उत्पन्न हो जाता है।

वाणी और बगलामुखी
कई लोगों में हकलाहट या वाणी की समस्या होती है। ऐसे लोग मां बगलामुखी का आश्रय ले सकते हैं। वाणी के अधिष्ठाता गणपति भी हैं, और मां बगलामुखी में सरस्वती की ऊर्जा भी विद्यमान है। इसलिए वे वाणी की अधात्री कही जाती हैं।

मां बगलामुखी श्रीकुल और कालिकुल दोनों में पूजित हैं। इनमें सरस्वती, लक्ष्मी और काली — तीनों स्वरूपों की ऊर्जा है। इसीलिए वे भगवान शिव की भी अत्यंत प्रिय हैं।

विशेष गुण
मां बगलामुखी वाक् स्तंभन करती हैं।

वे बुद्धि स्तंभन करती हैं।

वे नकारात्मक क्रियाओं को स्तंभित करती हैं।

इसलिए जहां मां बगलामुखी का ध्यान होता है, वहां नकारात्मकता का प्रभाव कम हो जाता है।

साधना और हवन
साधना हेतु गुरु दीक्षा आवश्यक है, लेकिन प्रार्थना हेतु नहीं।
कुछ स्थानों पर मिर्ची हवन होता है, जैसे नलखेड़ा मंदिर में। यह साधारण हवन नहीं है। इसमें त्रुटि होने पर साधक को भारी पड़ सकता है। इसलिए ऐसे अनुष्ठान गुरु के मार्गदर्शन में ही करने चाहिए।

भगवती को प्रिय आहुतियाँ :
हल्दी
पीत पुष्प (कनेर, चंपा)
केसर
कस्तूरी
चंदन
गोघृत (गाय का घी)
सरसों तेल (सुरक्षा हेतु)
पायस (दूध-केसर युक्त खीर)

इनसे भगवती की प्रीति होती है।

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