भैरव साधना और आध्यात्मिकता पर विमर्श “भैरव विमर्श: भय से अभय तक”
प्रश्न: भैरव की सेवा में ही है तो भैरव विमर्श आपके साथ किया जा सकता है। सबसे पहले मैं भैरव ही आपसे समझना चाहूंगी कि भैरव जो हैं, वे क्या हैं और क्यों उनकी आराधना, उनकी साधना महत्वपूर्ण है?
उत्तर: भैरव—सबसे पहले इनके शाब्दिक अर्थ को समझना चाहिए। हम लोग सनातन में हैं। सनातन में विशेष रूप से प्रत्येक देवता का नाम जो भी रखा गया है या जिस भी देवता की हम अर्चना करते हैं, उसके नाम के पीछे एक गहरा अर्थ छुपा होता है। यदि उस अर्थ के अनुसार हम उस देवता की आराधना करें तो हमारे लिए विशेष रूप से फलदायी होती है।
भैरव का शाब्दिक अर्थ है—भय का निवारण करने वाले देवता। जब भैरव देव हैं तो वे भय का निवारण करते हैं। हर जगह बाबा भैरव को क्षेत्रपाल नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि भय का निवारण करने वाले देवता होने के कारण वे क्षेत्र के रक्षक भी माने जाते हैं।
प्रश्न: भगवान भैरव की सेवा क्यों की जाए? किस लिए की जाए?
उत्तर: बाबा भैरव तत्व शिव तत्व हैं। उज्जैन में भैरव की साधना तीन प्रकार से होती है—सात्विक, राजसिक और तामसिक। बहुत से देवताओं में राजोपचार और तत्वोपचार होते हैं, परंतु तामोपचार बहुत कम देवताओं में होता है, जैसे देवी और भैरव।
उज्जैन में विशेष रूप से तीनों प्रकार से बाबा भैरव की सेवा फलदायी कही गई है, क्योंकि अवंतिका क्षेत्र भगवान भैरव का विशिष्ट शक्तिपीठ है। जैसे काशी में काल भैरव हैं, वैसे ही अवंतिका में काल भैरव प्राधानिक रूप से विराजमान हैं।
सभी देवताओं की सेवा सात्विक रूप से की जाए तो वह सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है और साधक को शुभ फल देती है। बाबा भैरव को शिव का ही स्वरूप माना गया है। कुछ ग्रंथों में वे शिव के अवतार बताए गए हैं और कुछ में साक्षात् शिव।
जैसे शिव भोलेनाथ हैं और जल्दी कृपा करते हैं, वैसे ही बाबा भैरवनाथ भी अत्यंत कृपालु हैं। कलयुग में विशेष रूप से हनुमान और भैरव प्रत्यक्ष देवता बताए गए हैं, जो पृथ्वी पर यथा समय विराजमान रहते हैं। इसलिए भैरव साधना से साधक को तुरंत फल मिलता है।
प्रश्न: प्रत्येक देवता की प्रतिमा में जो हाथ की मुद्रा होती है, उसका नाम क्या है?
उत्तर: इसे हम सामान्यतः आशीर्वाद समझते हैं, परंतु इसका विशेष नाम है—अभय मुद्रा।
प्रत्येक देवता अपने हाथ में अभय मुद्रा धारण करते हैं। इसका अर्थ है कि वे साधक को भयमुक्त कर रहे हैं। देवता की अभय मुद्रा देखकर साधक के भीतर आनंद उत्पन्न होता है और उसे लगता है कि देवता प्रसन्न हैं।
भैरव तो भय का नाश करने वाले देवता हैं। केवल स्मरण करने मात्र से ही वे भय का नाश कर देते हैं।
प्रश्न: भैरव का पूजन किस स्वरूप में होता है?
उत्तर: भैरव का पूजन दो स्वरूपों में होता है—
1:- काल भैरव
2:- बटुक भैरव (जिसे आनंद भैरव भी कहा जाता है)
सात्विक पूजा विशेष रूप से बटुक भैरव/आनंद भैरव की होती है।
प्रश्न: बाबा आनंद—अब इसमें आनंद ही नाम क्यों रखा गया? जब बटुक स्थिति है तो आनंद ही नाम क्यों है?
उत्तर: किसी भी बालक की स्थिति देखिए—वह हर समय आनंदमय रहता है। जीवन में कोई भी मनुष्य पूर्ण आनंदमय नहीं रहता, बच्चों को छोड़कर।
बालक को कोई भी सूचना दें, वह प्रसन्न ही रहता है। यही स्थिति बटुक भैरव की है। वे सदैव आनंदमय रहते हैं।
इसलिए उन्हें आनंद भैरव कहा गया।
जब देवता सदैव आनंदमय हों तो साधक केवल नमन कर ले, थोड़ी पूजा कर ले, मानसिक रूप से स्मरण कर ले—इतना ही पर्याप्त है। वे तुरंत प्रसन्न होकर फल प्रदान करते हैं।
बालक किसी भी वस्तु से विशेष लगाव नहीं रखता, जो उसके पास होता है वह दे देता है। वैसे ही भैरव अत्यंत दानी हैं।
साधक को केवल नियमित रूप से उनकी सेवा और स्मरण करना चाहिए। जब साधक का आचरण भैरव से जुड़ जाता है तो वे तुरंत कृपालु हो जाते हैं।
इस प्रकार भैरव सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं और भय का नाश कर साधक को निर्भीक बनाते हैं। निर्भीक साधक साधना-पथ पर बहुत आगे बढ़ता है।
प्रश्न: भैरव मंदिर श्मशान में ही क्यों होते हैं?
उत्तर: श्मशान सबसे बड़ा भय का स्थान माना जाता है। जब भय की निवृत्ति करनी हो तो वहीं भय के देवता भैरव की पूजा की जाती है। श्मशान सत्य का स्थान है—सत्य, शिव और सुंदरता वहीं मिलते हैं। इसलिए भैरव की स्थापना श्मशान में की गई है।
प्रश्न: अष्ट भैरव ही क्यों होते हैं?
उत्तर: भैरव क्षेत्रपाल हैं और क्षेत्र की रक्षा करते हैं। पृथ्वी पर आठ दिशाएं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य) प्रत्यक्ष हैं। इन आठ दिशाओं की रक्षा के लिए आठ भैरव स्थापित किए गए।
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