कुछ दिनों से मेरी पत्रकार बहनें मित्र लगातार पूछ रही हैं कि हाल के केसों पर मैं क्यों नहीं बोल रही। मैंने सोचा कि अगर बोल भी दूं तो फर्क क्या पड़ेगा? लोग बस कहेंगे कि हां, उन्होंने आवाज उठाई। लेकिन यह सिलसिला रुकता नहीं। उम्र निकल गई, सब कुछ वही हो रहा है। फर्क बस इतना है कि पहले बेटियां बोल नहीं पाती थीं, अब सक्षम होकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही हैं। यही एक बड़ी उपलब्धि है कि बेटियां अब अपनी बात कहने लगी हैं, लेकिन इसके जवाब में समाज ने उन्हें दबाने के नए तरीके खोज लिए हैं।
हाल ही में पत्रकार रीत जी ने मेरा इंटरव्यू लिया। उन्होंने पूछा कि आज की बेटियों के लिए मेरा संदेश क्या है। मैंने कहा: खूब पढ़ाओ, उन्हें स्वावलंबी बनाओ, उनका स्वाभिमान बचाकर रखें, संस्कार दें, दूसरों का सम्मान करना सिखाएं, जिम्मेदारियां समझाएं। उन्हें ताकत दें कि अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। लेकिन जहां उनका स्वाभिमान डगमगाए, वहां उन्हें तुरंत वापस बुलाइए। विदा करते समय यह भाव दीजिए कि “यह तुम्हारा घर था, है और रहेगा।” यही भाव लड़की को कभी झुकने नहीं देता, न निराश करता, न आत्महत्या की ओर ले जाता।
समाज अब भी वही है: शादी कर दी, विदा कर दी, और द एंड। माता-पिता को अपनी बेटी की भावनाएं पहचाननी चाहिए। शादी के बाद भी उसके मन को समझना चाहिए। लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर चुप रहना गलत है। आपने एक इंसान को जन्म दिया है, उसे संभालना भी आपकी जिम्मेदारी है। अगर आप उसकी पीड़ा को नहीं समझते, तो आप भी उतने ही दोषी हैं जितना वह परिवार जो उसे सताता है।
मैं अपनी जिंदगी देखती हूं तो लगता है काश मेरे माता-पिता ने मेरा ध्यान रखा होता। मैंने भी गलत कदम उठाने की कोशिश की थी। हर लड़की को भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है। बाकी तो ईश्वर ने उसे शक्तिशाली बनाया है। वह सब संभाल सकती है, लेकिन भावनात्मक सहारा ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
मैं फिर कहती हूं: बेटियों को संस्कारों के साथ यह भी सिखाइए कि स्वाभिमान से जीना है। परिवारों में ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्हें कानून भी पकड़ नहीं पाता। छोटी-छोटी बातों पर ताने दिए जाते हैं, अपमान किया जाता है। यह सब कितना कोई सहेगा? अगर यही सिखाना है कि दिन-रात गालियां सहो, तो यह संभव नहीं। आज की पढ़ी-लिखी बेटियां अपने अधिकार और कर्तव्य जानती हैं। उन्हें चुप कराना अब आसान नहीं है।
मैं उन सासों से कहना चाहूंगी: अगर आप किसी की बेटी को घर ला रहे हैं तो उसे संभालने की हिम्मत रखें। नहीं तो अपने लड़कों को कुंवारा ही रखें। बहू पत्नी होती है, नौकरानी या फ्रस्ट्रेशन निकालने का साधन नहीं। कानूनों में भी बदलाव आना चाहिए ताकि छिपे हुए अत्याचारों पर कार्रवाई हो सके।
मैं उस जज महोदय को धन्यवाद देती हूं जिन्होंने हाल ही में कहा: “कोई एक केस बताइए जिसमें बहन, ननद या सास जली हो। क्यों सिर्फ बहुएं जलती हैं खाना बनाते समय?” अपराधी भी पैटर्न नहीं बदल रहे। उन्हें लगता है यही तरीका है। यह सोच ही बताती है कि समाज की मानसिकता कितनी जड़ और क्रूर है।
इसलिए मैं कहती हूं: जो लड़कियां बोल्ड होकर जवाब देती हैं, उन्हें देना चाहिए। चाहे लोग कहें कि बदतमीज हैं। यह सुन लेना बेहतर है बजाय तिल-तिल कर घुटने और मरने के। यही मेरा संदेश है




