Friday, March 13, 2026
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लेखन विधा: ग़ज़ल तथा अन्य विधाएं -कविता(हिंदी, अंग्रेज़ी)

नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल में आप सभी दर्शकों का स्वागत है आज बात करेंगे हिंदी साहित्य और शुद्धता पर पूनम मटिया जी से जो हिंदी भाषा के साथ त्रुटि की जा रही है और उसमे न और म के स्थान पर बिंदु से शब्द को पूरा किया जा रहा है लेकिन उसको बताया और समझाया नहीं जा रहा है कि बिंदु केवल सरलीकरण के लिए है। कि कैसे शब्द और वर्ण को लिखा जाता है। तो इसी पर बात करेंगे डॉ पूनम मटिया जी से
नाम: पूनम माटिया, रुस्तगी (विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर मानद उपाधि प्राप्त))
माता-पिता: स्व.मैना एवं स्व. श्याम लाल गुप्ता
पति: श्री नरेश माटिया
संपर्क : पॉकेट ए, 90 बी, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110095
फ़ोन: 9312624097, ई मेल: poonam.matia@gmail.com
सम्प्रति : अध्यक्ष, अंतस्(साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था), स्वतंत्र लेखन, मंच-सञ्चालन, साक्षात्कारकर्ता, साहित्यिक-संपादन, इग्नोउ अकादमिक कॉउंसिलर।
शिक्षा : बी. एस. सी.; एम. एस. सी.(न्यूट्रीशन), बी. एड.; एम. बी. ए.(मानव संसाधन प्रबंधन); एम. ए. (हिन्दी)
भाषाएँ : हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, उर्दू
साहित्यिक व् सामाजिक संस्थाओं में सक्रियता
*पूर्व प्रान्त मंत्री (पाँच वर्ष), दिल्ली, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
*अध्यक्ष, अंतस्, (2019 सेअबाधित पाँच वर्ष)
*सदस्य, जापान हिन्दी सांस्कृतिक केन्द्र, जापान,
*राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मान्यता प्राप्त पत्रकार असोसिएशन, कानपुर

लेखन विधा: ग़ज़ल तथा अन्य विधाएं -कविता(हिंदी, अंग्रेज़ी)-छंदबद्ध, छंद-मुक्त; कहानी, नाटिकाएं, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, शोध पत्र आदि|

प्रकाशित कृतियाँ :
एकल काव्य संग्रह-

  1. स्वप्न श्रृंगार-2011,
  2. अरमान-2012,
  3. अभी तो सागर शेष है-2015,
    4.अभी तो सागर शेष है(द्वितीय)-2022
  4. क्षितिज के छोर तक -2024
  5. ‘कलर्स ऑफ़ सिम्फनी’-जुलाई 2024(अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह) 7. ‘शजर पे चांद उगाओ’- ग़ज़ल संग्रह, अगस्त 2025

प्रश्न:- अंग्रेजी भाषा से पढ़ाई करने के बाद डॉ पूनम मटिया ने हिंदी साहित्य कैसे और क्यों चुना?
उत्तर:- डॉ पूनम मटिया जी कहती हैं कि मई अपनी इच्छानुसार हिंदी साहित्य में आयी हूँ। क्योंकि मैं विज्ञान की विधार्थी और पढ़ने पढ़ाने वाली रही हूँ। डॉ पूनम मटिया जी ने बचपन से ही विज्ञान से पढ़ा लिखा और साथ साथ अंग्रेजी में पढ़ा लिखा है। शुरुआत पढ़ाई के दिनों में हिंदी से इतना लगाव नहीं था। क्योंकि 9th से लेकर 12th कक्षा तक अंग्रेजी भाषा से ही हूँ और फिर कॉलेज भी ऐसा ही था जहाँ हिंदी बोलने में सजा मिल जाती थी बीएड भी अंग्रेजी भाषा में ही हुआ तो पूरी पढ़ाई अंग्रेजी भाषा में ही हूँ। लेकिन जब एमए किया तब कहीं जा कर हिंदी जिंदगी में आयी। हिंदी के साथ साथ उर्दू से भी मुलाकात थोड़ी थोड़ी होती रही लेकिन हिंदी मातृभाषा है दिल्ली करोल बाग की रहने वाली हूँ। यहीं पर जन्मी और यहीं से पूरी पढ़ाई लिखाई की तो हिंदी तो रग रग में थी ही वो कहीं जाने वाली तो नहीं थी लेकिन यह है कि बहुत साल अंग्रेजी बोलने और लिखने के बाद जब मैं हिंदी साहित्य सन 2009 में आयी और हिंदी की कविता में आयी तो मुझे महसूस हुआ की मेरा जो अपना भाषा ज्ञान है अपना शब्दकोश है मुझे बढ़ाना चाहिए। क्योंकि साहित्य का यह है कि इसका लिखावट जो समाज के हित के लिए हो और समाज से हमे सिर्फ लेना ही नहीं देना भी पड़ता है। तो हिंदी साहित्य भाषा सबसे सरल सहज जैसे मुझे माध्यम लगा और मेरी रूचि का लगा और खुद से कविता उतरी। शुरू में छोटी छोटी दो दो तीन तीन पंक्ति की लम्बी भी कवितायेँ उतारी। छंद मुक्त उतरी इसके बाद ग़ज़ल भी सीखी और लिखी भी।
“दर्द के रुत में तबस्सुम लिए आती है ग़ज़ल ,
बेसहारों का सहारा दिए जाती है ग़ज़ल।। “
और पापा जी की भी पसंदीदा क्षेत्र जो था वो ग़ज़ल का ही था। और पहले कविता आयी दोहे आये गजलें आयी कहानी आयी नाटक भी आये जिंदगी में बहुत सारे नाटक लिखे और मंच पर नाटक किये भी हैं। ये जो साहित्य की धाराएं हैं वो कहते है न कि एक में आ जाती हैं। मैंने एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है। “अभी तो सागर शेष है”।। तब मैंने कहा कि
अभी हुआ है मात्र किनारा, अभी तो शेष है सागर सारा।
अभी तो केवल लहर उठी है , अभी शेष है विप्लपधरा।।

प्रश्न: – हिंदी साहित्य का जो वर्तमान स्थिति है आप उसे कैसे देखते हैं ?

उत्तर: – आज हिंदी की जो बात करें तो हिंदी पहले हमारी मुख्य भाषा नहीं बनने वाली थी। जो मुख्य भाषा बनने वाली थी वो ब्रज भाषा बनने वाली थी। लेकिन अचानक ही लगभग सन 1800 य 1900 के बीच हिंदी एकदम से कड़ी बोली जो है वो प्रचलित हो गयी और सन १९०१ के बाद तो बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो गई और दिल्ली में तो खड़ी हिंदी बोली जाती है और हमारी भाषा में तो तू भी होता है लेकिन उत्तर प्रदेश लखनऊ की तरह आप भी होता है तो हिंदी का यह है कि जो भाषा है वो बहुत ही सरल सहज है। डॉ पूनम मटिया जी लिखती हैं कि
” वैज्ञानिक आधार है मधुर बहुत रसधार ” एक बात ये भी है कि संस्कृत के बाद हिंदी ही सबसे वैज्ञानिक भाषा है। जैसे बोलते हैं। वैसे ही लिखते हैं। अंग्रेजी भाषा के साथ ऐसा नहीं है।
” वैज्ञानिक आधार है, मधुर बहुत रसधार ,
तुलसी सुर कबीर ने रच डाला संसार।
रच डाला संसार की दुनिया अब तक बांचे,
ढाल रहे मन भाव लिए हिंदी के सांचे।।”

तो हिंदी के सांचे में हम जो हिंदुस्तानी लोग हैं तो हिंदी में सोचते हैं हिंदी में सपने देखते हैं हिंदी में ही गुस्सा भी करते हैं। हिंदी ही प्यार की भाषा है। तो हिंदी तो हमारे अंदर रची बसी है। वो अलग बात है कि जो पहले विद्यालयों में सिखाई जाती थी कि उसको तर्क के साथ बताते थे की ये शब्द कैसा बना ये वर्ण कैसे बना है अब जो है उसको कंप्यूटरीज़ युग में सरल सहज करने के लिए जैसे पहले हम हिंदी में आधा न लगते थे अब ऊपर बिंदी लगा के काम चला लेते हैं। अब आप बिंदी जानते हैं कि कभी म के लिए तो कभी न के लिए तो कभी अंक के लिए होती है तो बिंदु पहले सिखाते थे अब नहीं सिखाते हैं अब सभी जगह न, म, अंक, चाँद बिंदु को हटा कर बिंदी लगा दिया है। तो ये जो सरलीकरण हो रहा है ये हिंदी भाषा को थोड़ा ख़राब कर रहे हैं।

क्योंकि हिंदी भाषा का जो उद्गम है जिस उद्गम से हमने जिस भाषा को पढ़ा और सिखाया जाता था वो नियम अब कम होते जा रहे हैं। भाषा का सरलीकरण करने से बोलने में आसान तो हो गई लेकिन उसकी जो सौंदर्य है वो ख़त्म हो गया है। इसीलिए जो लोग शुद्ध हिंदी में लिखते हैं आप जन भाषा में बोल और लिख रहे हैं तो वो प्रचलित ज्यादा होगा। लेकिन आप क्लिष्ट हिंदी में लिख रहे हैं तो जिसको पढ़ने और समझने के लिए एक गुरु एक अध्यापक की जरूरत पड़ती है।

हिंदी साहित्य धारा के इस रोचक बातचीत को देखने के लिए दिए गए लिंक पर क्लीक करे और चैनल को सब्सक्राइब करें।

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