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उज्जैन में काल भैरव की उत्पत्ति कैसे हुई?

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उज्जैन में काल भैरव की उत्पत्ति कैसे हुई?

जय श्री काल भैरव काल भैरव जी की उत्पत्ति स्वयं भगवान यहां आकर के विराजमान हुए हैं। किसी ने भैरव जी की उत्पत्ति नहीं करी है और ना ही किसी ने राजा भरथरी ने 6500 वर्ष पहले निर्माण कराया था। भगवान यहां विराजमान ऐसे हुए। जैसे पूरी सृष्टि की रचयिता करने वाले ब्रह्मा जी थे। ब्रह्मा जी का मस्तक थे। पांच जो पांचवा मस्तक था उसको अहंकार आ गया था। अहंकार आने के बाद में वो कहे कि मैंने बनाई सृष्टि इस सुंदर सृष्टि को खत्म करना चाहता हूं। पांचवा मस्तक ब्रह्मा जी का बोला। फिर सभी ब्रह्मा जी ने जो शिव जी थे सभी लोग आए विष्णु भगवान ने बोले कि हम बड़े हम बड़े विष्णु भगवान ने कहा कि अपने नाथ कौन है? शिव जी शिव जी के पास चलिए अपन बताते हैं कि कौन बड़े हैं। तो शिव जी के पास सभी देव गए और शिव जी को बोला विष्णु जी ने कि साहब ये सृष्टि खत्म कर रहे हैं। तो सृष्टि के बारे में बताइए। तो शिव जी के कुरस से भैरव जी की उत्पत्ति हुई। भर जी की उत्पत्ति होते ही ब्रह्मा जी का जो पाच समझ सकता है वो भैरव जी ने छेदन कर दिया था इस उंगली से इसलिए इस उंगली से पूजा नहीं होती है तो अच्छे के लिए करो बुरे के लिए दोस्त तो दोष लगा ब्रह्मा जी को भैरव जी को ब्रह्म हत्या का दोष लगा दोष लगने बाद में सब दूर घूम लिया पीड़ा होने लगी एक काशी के कोतवाले यहां के सेनापति के रूप में विराजमान है एक काशी में आकाशवाणी हुई कि आप उज्जैनी नगरी में जाइए या शिपला नदी के स्नान कीजिए और तामसिक पूजा में भैरव पर्वत पे बैठिएगा तो भगवान यहां आकर के भैरव पर्वत पे विराजमान हो गए तो तामसिक पूजा में मास मदिरा जो भी अवगुण होते हैं भगवान भैरव जी को चढ़ाए जाते हैं। जैसे मदिरा है मदिरा भगवान को शौक नहीं है मदिरा पीने का। भगवान जो अवगुण होते हैं वो पिया तो यहां शिव जी थे भोलेनाथ जी उनको पता चला कि मेरी नगरी में व्यक्ति कौन है साहब इतने सब पी रहे हैं तो शिव जी आए इनसे भैया आप कौन हो तो उन्होंने बोला मैं आपके क्रोध से उत्पत्ति हुई थी मेरी और मैं यहां विराजमान हूं तो शिव जी ने इनको वरदान दिया कि आपके दर्शन यहां सेनापति के रूप में आप विराजमान होइए। आपके दर्शन करने से जो भी आपके दर्शन जो भी कष्ट होता है जिसे कोई पीड़ा कोई दोष हो वो दोष दूर हो जाता है भक्तों का। इसलिए भगवान यहां मदिरा पान करते हैं। भगवान को शौक नहीं है मदिरा पीने का और मदिरा किसी को पीना भी नहीं चाहिए। ये सिर्फ भगवान के लिए बुरी चीज बनी है। जो अपने अवगुण होते वो समा करके भगवान को मदिरा का भोग लगाते हैं। जय श्री काल भैरव

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