विषय:- 15वीं पीढ़ी से पारंपरिक कला पख़वाज वाद्ययंत्र
सीरीज़:- Music Tales
अतिथि:- पं ऋषि उपाध्याय
नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। आज बात करेंगे भारत की संस्कृति से जुड़े हुए वाद्य यंत्र की जो बहुत ही पुराना वाद्य यंत्र है। यह इक घराने की परम्परा भी है जी ऋषि शंकर उपाध्याय, संगीत जगत का एक कुशल और प्रतिष्ठित नाम, 500 साल पुरानी पंडित वासुदेव उपाध्याय पखावज परंपरा गया, बिहार के प्रख्यात पखावज मास्टर हैं। उन्होंने अपने संगीत कौशल को अपने प्रसिद्ध परिवार से विरासत में प्राप्त किया, और अपनी यात्रा की शुरुआत अपने दादा पं. रामजी उपाध्याय, एक मृदंग आचार्य, और अपने पिता पं. रवि शंकर उपाध्याय के मार्गदर्शन में की। उनका संगीत आज भी प्रेरणा देता है और प्रतिष्ठित आयोजनों को शोभा प्रदान करता है। ऋषि उपाध्याय का संगीत के प्रति जूनून असीम है और वे इस समृद्ध परंपरा को आधुनिक युग में आगे बढ़ा रहे हैं, पांच वर्ष की उम्र से ही अपने प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आज वे गर्व से अपने परिवार की इस पारंपरिक कला को सहेजते हुए 15वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
प्रश्न: – ऋषि शंकर उपाध्याय संगीत में पखावज वाधक कितने वर्ष पुराना है और घराना कौन सा है ?
उत्तर: – चूँकि पखावज प्राचीन साल से हमारे शास्त्रीय संगीत का जैसे अभी आपने गणेश स्तुति सुनी। हमारे भारत संस्कृति की परम्परा है की हमारे यहाँ कोई भी कार्य शुरू होने से पहले गणेश जी कि आवाहन हम करते हैं। हमारे परम्परा में और पखावज वादक परम्पराओं में यह होना बहुत जरूरी है। और पखावज भगवान गणेश का साज़ भी हैं।
इसके सिद्ध वादक भगवान गणेश जी हैं तो हमारी परम्परा पंडित वासुदेव उपाध्याय पखावज परम्परा जो की ५०० वर्ष पुरानी है और मैं १५वी पीढ़ी लगातार पखावज की प्रस्तुति दे रहे हैं। इस वक्त अपने घराने की और यह सिलसिला सिर्फ पखावज ही नहीं ध्रुपद गायकी भी है। ५५० वर्षों से इक से इक दिग्गज पखावज वादक रहे हैं मेरे महान दादा पंडित वासुदेव उपाध्याय जी जिन्होंने पखावज के क्षेत्र में इतना कार्य किया है कि इतनी सिद्धि प्राप्त की कि हमने अपने परम्परा में उनका नाम दिया है।
हमारी पीढ़ी हरिदास जी के वंशजों से आती है स्वामी हरिदास जी ध्रुपद के महान रचयिता थे और मितान सिंह जी के गुरु थे। तो उसके बाद मेरे दादा जी पंडित राम जी उपाध्याय जी और उनके भाई पंडित बलदेव उपाध्याय जी भी पखवाज के महान कलाकार रहे हैं। उनके बाद पिता जी पंडित रवि शंकर उपाध्याय जी इसके मैं जी ऋषि शंकर उपाध्याय इस परम्परा को चला रहे हैं और पखवाज को इक बड़े पायदान पर लेकर आये हैं।।।

प्रश्न :- पखवाज की धुन और बनाने की विधि क्या है?
उत्तर: – पखावज की जो धुन आती है अलग अलग प्रकर से तो इसमें इक तरफ आता तो इक तरफ स्याही लगाया जाता है। और जिस तरफ स्याही लगाई जाती है उस तरफ की धुन शार्प आती है और जिस तरफ आटा लगाया जाता है उस तरफ से गंभीर धुन या डीप धुन या नन्द स्वर आता है। और आटा इस लिए भी लगते है क्योंकि इस पखवाज को मंगलवाद्य भी कहा जाता है जैसे मंदिर में शंख घंटी घडियार इतय्दी ये भारतीय परम्परा का सबसे पहला वाद्य यंत्र पखावज है। और इसको भगवान शंकर ने ही पखावज का अविष्कार किया है क्योंकि भोले नाथ ने इक राक्षस का वध किया था तो उसके शरीर से और उसके चमड़े से रस्सी बना कर बनाया था पखावज को ये आदि अनादि काल से चला आरहा है।
पंडित ऋषि शंकर उपाध्याय जी के द्वारा भारतीय वाद्य यंत्र पखावज के इतिहास के विषय पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें और चैनल को लिखे शेयर सब्सक्राइब करें।।
Note: – शो पर बोली गयी कोई भी बात चैनल के द्वारा लिखित नहीं है जो भी अतिथि या प्रवक्ता बात कर रहे हैं वो उनके खुद की विचारधारा हैं भारत मेरे साथ चैंनल उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।




