मैं राजेश राठौर मेरे दादा जी जो थे बिल्कुल हिंदू मानसिकता के थे। एक कट्टर हिंदू व्यक्ति जैसा होता है कट्टर तो जब हम चार या पांच साल के रहे होंगे तब दादा जी ने हमें आरएसएस की शाखाओं में भेजना शुरू कर दिया मतलब बाल्यकाल से हम स्वयंसेवक थे संघ में एक ही चीज सिखाई जाती है सेवा और समर्पण तो बचपन से ही संस्कार हो गए बस सेवा करना समर्पण करना अपने जद में हो तो करना नहीं हो तो भी करना अधिकतर सामने वाला कोई भी आए उसकी मदद करना ही हमारा धर्म है।
हिंदू राष्ट्र और सनातन को आगे ले जाने के लिए आपको क्या चुनौतियां लगती है कि अगर हम धर्म को आगे ले जाना चाहते हैं तो क्या बेहतर चीजें हो सकती हैं। क्या चुनौतियां हैं? क्या समस्याएं हैं?
हिंदुस्तान नाम का उद्गम हिंदू से है। हिंदू रहेगा तो हिंदुस्तान रहेगा। अभी वर्तमान परिस्थिति ऐसी है कि दिखावा ज़्यादा होता है, दिखावा ज़्यादा करते हैं, काम कम करते हैं। और वर्तमान जो पीढ़ी है, वह आध्यात्म से और सनातन से हटके पाश्चात्य संस्कृति की ओर जा रही है। मेरा ऐसा मानना है कि अभी जो वर्तमान में संत हैं जैसे बागेश्वर महाराज हैं या प्रदीप जी मिश्रा है। उनको भी या प्रेमानंद जी महाराज हैं। उनको देख के अब मुझे लगता है कि कुछ युवा या युवा पीढ़ी अब धर्म की ओर आ रही है। आज की तारीख में मैंने देखा है कि कम से कम 5% लोगों के हाथ में काउंटर होता है। पहले कभी मैंने नहीं देखा ऐसा कि लोग धर्म की तरफ जा रहे हैं। तो अभी तो माहौल बन रहा है समाज के प्रति। बाकी ऐसा है कि हर व्यक्ति को समाज धर्म के लिए काम करना चाहिए। धर्म से जुड़े हुए रहना चाहिए। ये हमारी जड़े हैं। हम और उसी से हम अपने आगे वाले या बच्चों को भी यही संस्कार दे पाएंगे। और धर्म हमारी नींव भी कह सकते हैं अप। अगर नींव मजबूत होगी तो ही समाज व्यवस्थित और सुरक्षित रहेगा। इसलिए मेरा ये मानना है कि धर्म से तो जुड़ के ही रहना चाहिए।
हिंदू राष्ट्र बनाने में समस्या सबसे ज्यादा यही आती है कि जो वामपंथ भी निकलता है वो हमारे ही धर्म से ही निकलते हैं। तो इसको इस समस्याओं को आप कैसे देखते हैं? क्या यह एक बड़ी चुनौती है इस समय की?
नहीं मुझे नहीं लगता है मुश्किल से एक दो प्रतिशत लोग ऐसे होंगे जो हिंदू होने के बावजूद खुद को नहीं मानते होंगे कि हम हिंदू हैं। हमें तो शुरू से सेवा बस्ती में काम करना सिखाया गया है। जो हरिजन बस्ती होती है उसमें जाके हमने रक्षाबंधन मनाते थे। मिठाइयां वगैरह देना उनके घर पे खाना रक्षा सूत्र बंधवाना तो मुझे कहीं ऐसा नहीं लगा कि इस तरह की कोई कमियां कुछ लोग होंगे हर चीज में अपवाद होता है। हो सकता है एक या 2% लोग ऐसे हो जो इस तरह की नकारात्मक बातें करते हो। बाकी इस तरह की समस्या मुझे तो नहीं दिखती।
उसके मुख्य रूप से हिंदू समाज और हिंदू धर्म के लिए कार्य करता है। हिंदुओं को एकत्रित करना, देश के प्रति कार्य करना, देश के लिए समर्पण करना, हमारे जो प्रचारक भी रहते हैं वो मतलब 5 साल 10 साल के लिए अपना परिवार छोड़ के काम करते हैं। और सारी संघ की बहुत सारी परिकल्प है। उसके माध्यम जैसे अभी हम एक माधव सेवान न्यास के माध्यम से आई कैंप भी लगाते हैं। तो तीन साल से चल रहा है। एक डेढ़ साल तक मेरे निजी निवास पे चला हुआ है। मंदिर है वहां पे करने। अभी तक लगभग हम 4000 लोगों को उसमें मोतियाबिंद का ऑपरेशन करके लेंस लगा चुके हैं। उसमें हिंदू भी है, मुस्लिम भी है, निचली जाति के भी है, ऊंची जाति के भी है। इसलिए हम कम से कम हमारे नजरिए से हम जातपात और भेदभाव को नहीं मानते। नहीं मानते।
आरएसएस संघ के खिलाफ अपोजिशन हमेशा से अटैक करता है। बीजेपी पे कम करता है। कि इसे बंद कर देना चाहिए। तो आप क्या जवाब देंगे?
संघ से उन लोगों को दिक्कत है जो चाहते नहीं है कि भारत एक हो या भारत सुरक्षित रहे। तो जो संघ पे प्रतिबंध लगाने की बात करें तो मैं ये मानता हूं कि वो देशद्रोही हैं। सीधी सी बात ये है कि अगर आप देख रहे हैं कि हमारा देश सुरक्षित हो। एक एक रहे अगर वो नहीं चाहते मतलब सीधी सी बात है कि सामने वाले का मोटिव यही है कि देश सुरक्षित नहीं रहे तो देश के लिए अगर जो विरोध में सोचता है वो हिंदू भारतीय विचारधारा के खिलाफ सीधी सी बात है वो देशद्रोही।
समाज सेवा आप करते हैं तो समाज सेवियों के साथ मदद करते-करते आपको धोखे बहुत मिलते हैं तो फिर आपको मतलब मोटिवेट क्या करता है कि नहीं दोबारा से करते हैं
नहीं सेल्फ मोटिवेट रहते क्योंकि मैं भी बहुत निचले परिवार से आके आज कुछ भी थोड़ी बहुत व्यवस्थित अगर कंडीशन पे है तो सेल्फ खुद के ऊपर है। मेरा ऐसा है कि मेरा किसी दिन अगर नहीं भी बनती है और वो मेरे पास आया है तो मैं उसकी पूरी मदद करता हूं। हर तरह से हर संभव प्रयास करके मदद करता हूं। इवन मेरे परिवार को भी मैं यही बताता हूं कि कोई भी आए। अगर दुश्मन भी आया है तो उसको मदद करना है। अब किसी को दिखाना नहीं है। भगवान देख रहे हैं उसका जो प्रतिफल मिलेगा वो ऊपर वाला देगा। बाकी मदद तो करना चाहिए। मेरा अगर सक्षम बनाया है किस ऊपर वाले ने तो सब मदद करना चाहिए। मेरे दादा जी बोलते थे। थोड़ा सा बताता हूं कि हाथ हमेशा ऐसा रहना चाहिए। इस तरह से नहीं होना चाहिए। मतलब देने की मुद्रा में होना चाहिए। कभी भी लेने की मुद्रा में आपका हाथ नहीं रहे।
हम तो अच्छा राजेश जी एक एक क्योंकि आप पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं। तो मैं थोड़ा सा आज के मीडिया पे बात करना चाहूंगी। जैसे कुंभ मेले में हमने देखा कि किस तरह से जो है फालतू की चीजें हमें देखने को मिली। तो सोशल मीडिया कितनी ज्यादा बर्बादी करता है और कितना ज्यादा फायदा देता है। मीडिया का रुख मतलब आपको कैसा लगता है?
सोशल मीडिया तो मीडिया और सोशल मीडिया मैं मानता हूं दोनों अलग-अलग चीजें हैं। सोशल मीडिया पे एक नैरेटिव सेट अगर हो जाता है। कोई चीज ट्रेंड चल गया तो फिर वो उसी को आगे चलता रहता है। पॉजिटिव हो या नेगेटिव हो। अगर एक कोई मुहिम चल गई और वो चालू हो गई तो फिर अगर वो नेगेटिव होगी तो नेगेटिव माइंडसेट हो जाएगा। पॉजिटिव होगी। तो इसलिए मीडिया का तो यह कि जो ट्रेंड हो गया वो हो गया। इसलिए ना उसका मुझे लगता है फायदा है ना ही कोई नुकसान है। तो हर व्यक्ति अपनी समझ से देखता है ना मुझे लग रहा है कि मुझे इसमें क्या देखना है। जैसे अभी शंकराचार्य जी वाला चल रहा है कि उनको नहीं जाने दिया। अब कुछ लोग बता रहे हैं कि नहीं जाने दिया है। अब पुलिस बता रही है कि हमने उनको कहा कि आपने दो नंबर का बैरिकेड तोड़ दिया है। कुछ दिक्कतें हो रही है। आप यहां से उतर के पैदल जाइए। हम हम अब जो जिसने वो वाला मामला देख लिया कि हां नहीं जाने दिया तो उसकी वेव चल गई। समझने वाले का नजरिया होता है कि उसे क्या देखना है। हमारा नजरिया होना चाहिए कि हम सोशल मीडिया पे क्या देख रहे हैं और क्या एक्सपेक्ट एक्सेप्ट कर रहे हैं उस समय से क्या समझ रहे हैं?
अब जैसे आप समाज सेवा करते हैं ना तो कई सारे लोगों से आपका वो आपका अनुभव होता है आप मिलना मिलाना होता है तो आपको अपने लेवल पे क्या चैलेंजेस आते हैं जैसे कोई आपसे मदद करने आए तो आप आपको मन तो करेगा मदद करने का लेकिन कई बारी होता है कि आप नहीं कर पाते हैं तो आप
नहीं ऐसा तो मुझे नहीं लगता कि आज तक ऐसा कभी हुआ कि मैंने किसी को मदद से इंकार किया मैंने किसी की आग भी लगी तो हम आग बुझाने के लिए खुद भी सेल्फ उतर गए और मदद का ऐसा है जैसे कि मैं आपको बताता हूं तीन चार साल पहले इंदौर में कोई दो या ढाई साल का बच्चा एडमिट होगा एक जैन समाज का था उसके लिए मेरे पास कहीं से आया गया जिसको मदद की जरूरत है 3 सा 3 लाख का इसका खर्चा है तो मेरा सिनेरियो ऐसा रहता है कि सबसे पहले मैं कि मैं कितना कर सकता हूं। मैंने उनसे बात की कि मैं सोशल मीडिया के थ्रू आपको तीन चार लाख जो भी आप चाह रहे हैं वो करवा सकता हूं। पर उसके लिए मुझे सोशल मीडिया से करना पड़ेगा। मैंने मेरी तरफ से जो भी राशि 5000 या मुझे ध्यान नहीं जो भी मैंने सबसे पहले ट्रांसफर करके सोशल मीडिया पे पोस्ट की कि इस तरह से एक बालक की इसको नीड है और मैंने अपना सहयोग कर दिया और आप यह मानिए कि खाचरोद नगर की जनता इतनी शानदार है कि मेरी सोशल मीडिया पोस्ट इस तरह की होती है मुश्किल से एक या दो दिन में उस बच्चे के ₹3 लाख जो भी थे इकट्ठे हो गए और हॉस्पिटल में जमा हो गए। अभी रिसेंट लास्ट ईयर ही हमारे यहां एक सर्विस प्रोवाइडर थे बैंक के उनको भी ब्रेन हेमरेज हो गया था और उनकी शायद एक पत्नी है और बच्चे की छोटी बच्चियां थी मेरे पास उनके रिलेटिव का फोन आया कि उनको इतनी नीड है और कुछ करना है तो मैंने उनसे पूछा पहले कि मैं सोशल मीडिया से करूं आपको बुरा तो नहीं लगेगा बोले नहीं लगेगा उसमें भी मैंने वही किया कि मेरी तरफ से जो भी मुझे राशि डालना दी मैंने उसका स्क्रीनशॉट सेट किया और सोशल मीडिया पे डाल दिया कि ये हमारे मित्र हैं इनको इतनी नीड है और तीन तीन दिन में हमने 3 लाख 300 लगभग कुछ खाचरोत के लोगों से एकत्रित करके और उसको दे दी। तो मुझे लगता है कि सोशल मीडिया के थ्रू तो हम बहुत सारा डोनेशन और अच्छा उसका सदुपयोग भी कर पाते हैं। तो मुझे जैसे अभी हम शांति वन चला रहे हैं। कुछ भी हमें दिक्कत होती है हम सोशल मीडिया पे डालते हैं कि हमें इतना नीड है हो जाता है। तो चैलेंजेस तो नहीं आता। कुछ अगर एक दो% नेगेटिव बातें होती है तो फिर उसको अवॉइड करता हूँ।
शांति वन संस्था में आप क्या-क्या कार्य करते हैं ?
शांति वन हमारा जो है लायंस क्लब के थ्रू संचालित होता है। मैं लायंस क्लब का सेक्रेटरी हूं। उसकी सारी देखरेख और उसका मेंटेनेंस हमारे पास होता है। लगभग 25 से ₹00 महीने का उसका खर्चा होता है। जो भी अंतिम संस्कार आता है उसकी ₹2000 की रसीद होती है। उसके अलावा हमें जरूरत रहती है। कुछ वहां निर्माण करना रहता है। पुनर्निर्माण करना रहता है। उसके लिए फिर हम सोशल मीडिया से या मकर सक्रांति के दिन हम धन संग्रह करते हैं। दान के रूप में अभी लास्ट शायद हमने ₹158 या 59000 का धन संग्रह किया। अच्छा। तो खाचरोद नगर से तो मतलब और बाहर से भी ऐसा नहीं जो मुझसे जुड़े हुए लोग हैं वो बाहर से भी पेमेंट ट्रांसफर करते हैं और हमारा ऐसा है कि सिर्फ जो मद है उसी के अकाउंट में सीधा पेमेंट लेते हैं। मेरे पर्सनल में फिर भी कोई अगर डाल देता है तो मैं हैंड टू हैंड उसको वापस उसी में ट्रांसफर कर देता हूं। अगर संबंधित व्यक्ति को भी डाल देता हूं। आपने मुझे डाला था। मैंने इसी में डाल दिया। खाचरोद से तो अच्छा सहयोग मिलता है।
क्या सरकार के अधीन मंदिर होने चाहिए और अगर होने हैं तो फिर मंदिर का विकास इतना धीरे-धीरे क्यों होता है?
सरकार के अधीन वैसे देखा जाए तो जितने भी बड़े मंदिर हैं या शासकीय मंदिर सरकार के अधीन ही है। हम अब उस उनका ऐसा रहता है कि कलेक्टर जो रहते हैं उसके प्रबंधक रहते हैं और पुजारी उसका व्यवस्थाएं देखते हैं। हम बाकी होताना ये चाहिए कि पुजारी को अधिकार होना चाहिए। हम जितनी भी दान राशि वहां इकट्ठी हो रही है उस एक ट्रस्ट बना रहे और ट्रस्ट मिलके डिसाइड करे कि इतनी राशि है हमें इसका मंदिर में कहां लगाना है क्योंकि आज की तारीख में अपन ये मानते हैं कि गवर्नमेंट के थ्रू कोई भी पैसा आता है अगर ₹10 ऊपर से आता है तो नीचे जमीनी स्तर पर पहुंचतेपहुंचते ₹1 ही बचता है मतलब 10 या 20% ही राशि वहां लग पाती है तो अगर कोई समिति हो ट्रस्ट हो उस मंदिर की जो स्वयं अपने विवेक से खर्च करें क्योंकि वो लोकल में रहते हैं उन्हें पता है कि हमें यहां पे किस चीज की जरूरत है। हम दिल्ली बैठे या भोपाल बैठे लोगों को पता नहीं है कि यहां पे किस चीज की नीड है। तो समिति होना चाहिए। मंदिर की ही समिति होना चाहिए और उन्हीं लोगों का अधिकार होना चाहिए कि वो क्या खर्च करें वहां पर।

इसलिए हम ये धार्मिक यात्रा कर रहे हैं कि लोगों को पता चले और अभी जैसे अयोध्या की बात मैं आपको बताती हूं। हम अयोध्या गए थे तो राम मंदिर बन गया। वो तो बहुत भव्य है। सरकार पैसा भी लगा रही है। फंडिंग भी उसमें जा ही रही है। पर राम जी की जो कुलदेवी है जलपा माई मंदिर वो बहुत ही बहुत ही बुरी हालत में है और उसका कोई विकास नहीं हो रहा। तो वहां के पुरोहित ये उनका कहना ये है कि पैसा तो फंड तो अप्रूवल तो आता है लेकिन नीचे आतेआते जो आपने अभी बात कही तो स्थिति वही है। तो ऐसे कई सारे मंदिर है तो अगर सरकार के अधीन है तो सरकार को जो है तेजी से सभी मंदिरों को का कार्य करना चाहिए। और पुजारी भी अगर है कोई जैसे बिरला मंदिर में एक सिस्टम है कि आप ऑफिस में ही सब देंगे। पुरोहित को भी आप जो देना चाहते हैं वो भी ऑफिस में ही जाता है। ऑफिस से उनकी फिर तनख्वाह प्लस दक्षिणा वो ऑफिस वाले वापस करते हैं। तो वहां पे इस तरीके का सिस्टम है। इस सिस्टम को आप सही कहेंगे कि जैसे ट्रस्ट के पास में ही ज्यादा नहीं
जहां कम रश है या बिरला मंदिर माने कि मुश्किल से 100 – 50 – 200 लोग जाते होंगे। पर जैसे सांवरिया जी है, खाटू श्याम है वहां पे इतनी बड़ी संख्या में ऑफिस में जाके डोनेशन करना और क्योंकि अज्ञानता और जानकारी भी बहुत कम लोगों को रहती है। जनरली हिंदुस्तान में ये होता है कि मंदिर गए या तो दान पात्र में डाल दिया या थैली में रख दिया। तो वो ऑफिस वाली व्यवस्था जहां छोटे स्तर पे मंदिर हो जहां 100 50 श्रद्धालु जाते हो वहां तक ठीक है। बाकी बड़े लेवल पे वो मुझे नहीं लगता कि उसको हम ठीक से काम कर पाए।
प्राचीन और भव्य मंदिरों में कॉरिडोर बनाना कितना सही है ?
विकास तो महत्वपूर्ण है। जैसे उज्जैन का हमारा महाकाल मंदिर देखिए आप वहां पे अगर 1 लाख श्रद्धालु भी होंगे तो मुश्किल से एक से डेढ़ घंटे में वो दर्शन करके सामान्य जनरल में बाहर आ सकते हैं और इसी तरह अगर व्यवस्थाएं जैसे वृंदावन का भी आप मान लीजिए बांके बिहारी मंदिर वहां दर्शन करना मतलब जंग लड़ने के बराबर है कि आपने दर्शन करके अगर आप आ गए तो बहुत बड़ी बात इतना रश रहता है इतनी धक्कामुक्की रहती अगर कॉरिडोर रहेगा क्यों सही रहेगी तो व्यक्ति व्यवस्थित रूप से छोटे बच्चे रहते हैं महिलाएं रहती है तो आराम से जा के दर्शन करके वापस निकल सकते हैं इसलिए विकास तो जरूरी है
राजेश राठौर आप कोई अच्छा सा समाज के लिए संदेश देना चाहे और हमारी जनता जनार्दन को कुछ कहना चाहे और हमारी धार्मिक यात्रा के बारे में भी कुछ कहना चाहे ।
आपके चैनल के माध्यम से मैं यही संदेश देना चाहता हूं कि सभी लोग सबसे पहले तो एक दूसरे की मदद करें। धार्मिक स्थलों पर जाना शुरू करें। अपने बच्चों को मंदिर भेजें ताकि उनमें हिंदुत्व की विचारधारा आगे बढ़े। वो अपनी जड़ों से जुड़े रह। साफ सफाई रखें।और आपके चैनल के लिए मेरा यह कहना है कि आप काफी अच्छी धार्मिक यात्रा चल रही है। आपके चैनल को देख के हिंदू हिंदुस्तान के हिंदू मंदिरों की जानकारी जो हम लोगों को नहीं है आपको देख के हम देख रहे हैं कि इस तरह के भी मंदिर हैं और ऐसी व्यवस्थाएं भी हैं।




