सीता की वास्तविक शक्ति का उद्घाटन: नीलम राठी की अंतर्दृष्टियाँ
डॉक्टर नीलम राठी की अंतर्दृष्टियों से यदि माता सीता के विषय में बात करे तो स्त्री विमर्श के आधार पर वह वास्तविकता शक्ति में बहुत ही मजबूत थी।वो वास्तविकता शक्ति जो उनकी थी बहुत तेज, क्योंकि स्त्री विमर्श और स्त्री मुक्ति में दो से चार अपने अपने अलग अलग विचारधारा है ।एक तो जो पश्चाताप अवधारणा है कि स्त्री होती नहीं है, उसे बनाया जाता है। ये बिलकुल गलत है। स्त्री विमर्श जो है वो केवल मुक्ति का ही सवाल नहीं, सम्मान का भी सवाल है, क्योंकि कोई भी परिवार हो वो स्त्री के बिना अधूरा ही है। पूर्ण नहीं होता बिना इस तरीके।स्त्री के प्रति हिंसा अपराध मानते।ये पूर्व काल से ही भारतीय समाज में।इस हिंसा को स्वीकार नहीं गया है भारतीय समाज पूरी परंपरा में स्तरीय मुक्त थी।जैसे की शकुंतला उसने गंधर्व विवाह किया था।पांचाली ने उसने पांच लोगों से विवाह किया था।
द्रोपदी?और सीता का जैसे स्वयंबर हुआ था क्योंकि सीता में यह शक्ति थी कि उन्होंने धनुष को उठाकर एक ही स्थान से दूसरे स्थान पर रख दिया, इसलिए राजा जनक ने तोड़ने की बात सोचिए।उसके पीछे का एक बहुत बड़ा कारण है कि जब मेरी बेटी इतनी योग्य है तो मेरी बेटी का जिससे विवाह हो, जो मेरा दामाद बने वो भी इतना ही योग का हो तो मेरी बेटी सीता ने धनुष को उठाया है तो जो इसका पति बने वो इस धनुष को तोड़ सके।इसलिए उन्होंने स्वयम्बर रखा है। मैं किसी भी प्रकार की कोई भी शर्त नहीं रखी थी।और राजा जनक सीता की शक्ति को जानते थे।की वो मेरी बेटी योग में कम नहीं है। वो किसी भी प्रकार से।असहाय नहीं है कमजोर नहीं है, सीता जो थी।शादी के बाद आये वो एक संपन्न राज्य घराने में थी।वनवास राम को मिला था।सीता के एक सुंदर संपन्न राजघराने में बिना पति के स्वीकार नहीं किया।क्योंकि राम को बनवास हुआ, उनको वन में जाना था तो सीता को यह सुविधा अच्छी नहीं लगी कि मैं राजघराने में रहूं ।

क्योंकि सीता को वनवास नहीं मिला था। यदि वह चाहती तो राजश्री रूप में अयोध्या के राजमहल में रह सकती थी, लेकिन नहीं सीता ने राजमहल में रहना स्वीकार नहीं की।उनका ये अपना निर्णय था। इसी निर्णय को राम भी अस्वीकार नहीं कर पाते तो निर्णय लेने की जो क्षमता है जो आजादी और भारतीय समाज में स्वतंत्रता स्त्री की रही। सीता राम के साथ वन में रहती है, सीता स्वर्ण मृग को पाने की हट करती है, वह उनका निर्णय होता है।कमजोर कहा।और सबसे बड़ी बात कि जब सीता का हरण होता है, रावण लेकर जाताहै तो सीता किसी प्रकार से अस्मिता के खिलाफ़ नहीं।सीता को अशोक वाटिका में रखता है रावण लेकिन सीता के शक्ति के सामने वो उसको स्पर्श भी नहीं कर पाता।
उसकी इतनी हिम्मत नहीं होती की वो उसको छू सके या उसको स्पर्श कर सके।क्यों किसी ताकि सके इतनी तेज होती है वो इतनी बलशाली होती है? उसको देखने में मात्र से उसका तपोबल टूट जाता है।इसके बाद भी यदि कहे कि लोग लाज बस राम ने जब सीता वापस आते है अयोध्या 14 वर्ष का बनवास के बाद तो इसके बाद लोकलाज के उसमें आकर राम ने सीता को दोबारा से वनवास भेज देते हैं।कि सीता गर्भवती होती तब तो इसके पीछे का अर्थ ये होता है की स्त्री विमर्श की दृष्टि से देखेंगे तो गर्भवती पत्नी को वन में राम को नहीं भेजना चाहिए। ये एक तरीके से अन्याय था।और इसीलिए सीता वनवास में जब गई तो इस बात को लेकर पूरे भारतीय समाज ने राम को क्षमा नहीं किया।लेकिन राम की दृष्टि से देखेंगे एक राजा की दृष्टि से देखेंगे तो राजा का अपना कोई व्यक्तिगत नहीं होता है।राजा को पूरा लोक पूरा राज्य देखना होता है और जो पूरे राज्य के हित में होता है राजा को वो करना होता है वही उसकी विचारधारा होती है।
इसमें व्यक्तिगत राम की कोई राय नहीं होती है।उसको उस राजा को उस राम को अपना राजधर्म है और उसको सर्वोपरि रखना है।जहाँ तक सीता की बात है तो समाज मानता है कि सीता क चरित्र कमजोर नहीं था।वो बहुत ही निर्णय मिल लेने में सक्षम थी, शारीरिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी क्योंकि सीता के पूरे जीवन में जीतने भी प्रसंग बदले। जितनी भी स्थितियां ये हर समय हर स्थान पर।हर उसमें सीता स्वयं से निर्णय लिया और अपने निर्णय पर अटल रहे।सीता जो है वो स्त्री विमर्श से कमजोर पात्र नहीं हैं, वो स्त्री विमर्श का एक आदर्श पात्र हैं।जो हम सब के एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत होता है तो सीता कभी भी कमजोर नहीं पड़ी।
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