भगवान शिव ने कब धारण किया अर्धनारीश्वर का अवतार ?
पंडित शिवचरण शर्मा जो कि जयपुर से हम बताते हैं कि रामचरित मानस में भगवान शिव का अर्धनारीशवर के अवतार का उल्लेख मिलता है।कि भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती थी और एक बार माता सती के मन में विचार आया कि शिव जी किसकी आराधना करते हैं।तो उन्होंने भगवान शिव से पूछा तो उन्होंने पहले मना किया। फिर उन्होंने बताया कि मैं भगवान राम की आराधना करता हूँ, हमारे आराध्य देव भगवान राम हैं।तो माता सती जी ने सोचा कि ये सर्वलोकेश्वर है फिर भी ये आराधना करते हैं क्यों? ऐसा क्या है भगवान राम में?तभी माता शक्ति के मन में यह जिज्ञासा आई और उन्होंने भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए विचार किया और वो भगवान शिव को बोला की मैं उनकी परीक्षा लेना चाहती हूँ लेकिन भगवान शिव ने उन्हें मना किया। लेकिन नारी हट वो अपनी जिज्ञासा को जानने के लिए भगवान राम के पास माता सीता का रूप धारण करके चली गयी।जब भगवान राम ने उनको देखा और पहचान गया क्योंकि वो त्रिलोक स्वामी हैं।उन्होंने तुरंत माता सीता के रूप में माता सती को प्रणाम करके कहा कि माँ आप यहाँ कैसे है तो भगवान शिव कहाँ है?और आप अकेले वन में क्या कर रही है? तो माता सती ने देखा कि भगवान राम तो मुझे पहचान लिया है।तो उन्होंने वहाँ से चली आयी और शिवजी से झूठ बोला है की हाँ।हमें उनकी परीक्षा ले ली।लेकिन शिव जी तो अंतर्यामी है तो उन्होंने देख लिया कि क्या हुआ कि उन्होंने किस तरह से माता सीता को रूप धारण करके परीक्षा लिया हुआ है। माता सती ने। उन्होंने मन में विचार किया और उनको त्याग दिया,माता सती को स्वीकार करने से मना कर दिया।
तभी कुछ समय बाद राजा दक्ष के यहाँ महायज्ञ हो रहा था। उसमें राजा दक्ष ने सभी को आमंत्रण किया था। राजा दक्ष माता सती के पिता थे, लेकिन शिव जी को आमंत्रण नहीं किया क्योंकि शिवजी उनको प्रिय नहीं थे, इस वजह से वो उनको आमंत्रण नहीं किया।माता सती ने शिवजी से कहा कि मैं अपने पिता राजा दक्ष के यहाँ जाना चाहती हूँ क्योंकि उनके यहाँ महायज्ञ हो रहा है। शिव जी ने उन्हें मना किया कि बिना बुलाए किसी के यहाँ नहीं जाना चाहिए। वहाँ से कोई निमंत्रण नहीं आया है। आपको जाना उचित नहीं होगा, लेकिन।स्त्री हट के आगे शिवजी कुछ ना कर सके और माता सती अपने पिता के यहाँ यज्ञ में शामिल होने के लिए गयी।लेकिन जब वो राजा दक्ष के घर गई तो वहाँ उनको कोई स्थान नहीं मिला। भगवान का कोई भगवान शिव का कोई स्थान नहीं था।उनको ये इस ताना मिलना उनको अपमान हुआ। अब वो अपमान सह न सकी और उन्होंने उसी यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी।जब ये बात भगवान शिव को पता चले की माता सती ने अपने प्राणों की आहुति उस यज्ञ में दे दिया है, क्योंकि उनका भगवान शिव का कोई स्थान नहीं था तो भगवान शिव क्रोध में आकर।अपने दूत को भेजकर उस यज्ञ का विध्वंस कर आते हैं और राजा दक्ष को मारने के लिए बोलते हैं।ये सब होने के बाद भगवान शिव तांडव करते हैं। अपने क्रोध को शांत नहीं कर पाते,वियोग रूप में चले जाते है। किसी तरीके से विष्णु जी ब्रह्मा जी मनाते है फिर देवताओं ने माता सती का दूसरा जन्म माता पार्वती के रूप में कराया।और पार्वती को ये अफ़सोस रहता है कि भगवान शिव ने हमको किस लिए त्यागा?
उन्होंने कठोर परीक्षा साधना की तपस्या की।तब जाके कहीं शिव जी ने?माता पार्वती से विवाह करने के लिए राजी हो गए। उन्होंने देवताओं के कहने पर उनसे विवाह संपन्न किया और माता पार्वती पति पत्नी के रूप में भगवान शिव के साथ उनके स्थान पर आ गए।आपको एक जानकारी देते हैं की माता पार्वती की ही कई रूप थे जैसे की दुर्गा का, माँ काली का, गौरी का इत्यादि रूपों से वो जानी भी जाती थी क्योंकि वो जिस योग उसमें आती थी। क्रोध में आई तो माँ काली बन जाती है,जिस रूप में आती है वो उसी रूप से जानी जाती है।तो उनका एकरूप माँ काली। जब रौद्र रूप में माँ काली आई और पृथ्वी का विध्वंस करने लग गयी क्योंकि पृथ्वी में इतना पाप उमड़ आया था तो विध्वंस करने लगे उनको रोकने के लिए भगवान शिव ने उनके मैं खुद को समाहित करते हैं उनके पैरों के नीचे लेट जाते हैं।तो माँ पार्वत माँ काली ये देख नहीं पाती हैं और माँ काली से विनती करते हैं की हम आपको अपने आप में समाहित करते हैं।समाहित करने के बाद तब से भगवान शिव को अर्द्धनारीश्वर कहा जाता है।
Note: – शो पर बोली गयी कोई भी बात चैनल के द्वारा लिखित नहीं है जो भी अतिथि या प्रवक्ता बात कर रहे हैं वो उनके खुद की विचारधारा हैं भारत मेरे साथ चैंनल उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।
भगवान शिव ने कब धारण किया अर्धनारीश्वर का अवतार ?
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