भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का प्रसंग !
संगीत नाटक अकादमी के उप सचिव सुमन कुमार ने बताया कि भरत मुनि ने खुद एक कथा गढ़ी है या कही है। क्योंकि हम सब मानते हैं कि एक विचार यह भी है।की हम रचते नहीं है, हम पुनसर्जन करते हैं तो हम सब चीजों को मानते हैं की देवों से दी हुई है देवताओं से हमारे पास आयी हुयी हैं। तो इस नाटक का भी एक कथा गढ़ी गयी। तो ये बताते हैं कि त्रेतायुग में थोड़ा सा गडबड होना शुरू हो गया।सुर असुर राजा रंक देवता भगवान इस आधार पर लोग लड़ने झगड़ने लगे थे, आपस में ही कोई पुण्य काम नहीं कर रहा था, असुर राक्षस लोग जो थे वो प्रभावशाली हो रहे थे, वो देव के मंदिर भ्रष्ट कर रहे थे, तोड़ रहे थे तो सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए।और उन से असरों की शिकायत की।कि असुर इस तरीके से काम कर रहा है।भूलोक में। तब इस पर ब्रह्मा जी ने विचार किया और चारों वेदों को पढ़ा और देखा किसी प्रकार का कोई भी निवारण नहीं मिला, तब उन्होंने सभी वेदों को पढ़कर एक मिश्रण निकाल कर एक नए वेद का गठन किया, जिसे सभी लोग पढ़ सके। समझ सकें क्योंकि पहले जो चार वेद थे वो सीमित थे कि कौन लोग पढ़ेंगे, कौन लोग नहीं पढ़ेंगे, कौन उसका अध्ययन कर सकता है?और जब तक किसी वेद का या किसी ज्ञान का अनुभव नहीं होगा, तब तक लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे। तो इस अनुभव को सामने लाने के लिए भावनात्मक ढंग से उन्होंने सभी वेद से कुछ न कुछ लिया । क्योंकि एक जो वेद लिखना है भावनात्मक ढंग से उसके लिए जैसे …… ऋग्वेद से मंत्र, यजुर्वेद से विधि, अथर्वेद से रस और सामवेद से गीत लिया।
इन सभी को मिला करके कहा कि अब पंचम वेद या नाट्य वेद इसको कहा जाए। इसके बाद ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा कि इस विधा को तुम लोग सीख लो।लेकिन किसी ने नहीं सीखा। मना कर दिया कि इस वेद का हम प्रयोग नहीं कर सकते हैं। तब ब्रह्मा जी ने शिवजी से अनुरोध किया कि इस वेद को आप स्वीकार कीजिए क्योंकि आप में क्रोध भी है, तांडव भी है, प्रेम है, प्रसंग सभी रस है। शिवजी ने कहा है ठीक है, हम इसको स्वीकार करते हैं । तब शिवजी ने इसको स्वीकार कर लिया। नाट्य वेद को। तब उन्होंने सोचा कि इसको तो संसारिक होना चाहिए, तब इसे किसी को सौंपना पड़ेगा। तब उन्होंने भू लोक में देखा कि महर्षि भरतमुनि जो है वो अपने 100 पुत्रों के साथ तपस्या में लीन हैं।महर्षि भरतमुनि जो थे, वह ज्ञान में परिपूर्ण थे, उनके शिष्य भी।
इसके बाद शिवजी ने भरत मुनि को नाट्य वेद को सौंप दिया। तब भरत मुनि ने अपने पुत्रों को नाट्य का ज्ञान दिया और उन्होंने उसको सिखाया।क्योंकि ये एक ऐसी विधा है जो दिखती नहीं है। वह मेरे में है, मैं मंच करूँगा तो मुझे आप देखेंगे तो कहेंगे कि नहीं, लेकिन आप जब मंचन नहीं करूँगा तो मैं कोई और नहीं मैं ही रहूंगा । वो पात्र के आधार पर आधारित होती है।जब भरत मुनि ने पहला नाटक किया तो उसमें सारे पुरुष थे।तो जब इसको प्रस्तुत किया गया तो उसमें कोई रस नहीं नजर आया।उसको नहीं किया गया। फिर भरतमुनि का जो संपूर्ण पहला नाटक आया वह देवासुर संग्राम आया।
महर्षि भरतमुनि के नाम पर है विवाद?ये एक है या कई?
सुमन कुमार जी बताते है की भरतमुनि नाम पर भी विवाद है कि भारत एक है या बहुत लोगो का है, भारत कोई पड़ जाती है, भारत एक नाम है या एक विभाग है या एक कोई पद है जिसपर कई सारे लोग बैठकर काम करते हैं क्योंकि जब आप नाट शास्त्र का अध्ययन करेंगे।तो इसमें पूरा इतिहास समाया हुआ है। इसमें सौंदर्य का सब सूत्र समाया हुआ है।इसमें प्रतिमा, विज्ञान, गणित, संगीत, अभिनय, आलेख लेखन, फिलॉसफी इत्यादि है।तो भारतीय काव्य का सौंदर्य बोध इसमें छिपा हुआ है। वो सब समाया हुआ।और इसने पूरे जम्बू द्वीप में जितने भी प्रदर्शनकारी विधा के तत्व थे। वो सारे के सारे नाट्य शास्त्र में समाहित थे। यह एक ऐसा खुला हुआ मंच है जो किसी को नकारता नहीं है। वो कहता है कि इस ब्रह्मांड को हमने ओढ़ रखा है इस ब्रह्मांड में जो भी चीजें।वो मेरी छाया में है। क्योंकि ऐसी कोई वस्तु और विषय विधि नहीं है जो नाट्यशास्त्र के परिधि से बाहर हो।
Note: – शो पर बोली गयी कोई भी बात चैनल के द्वारा लिखित नहीं है जो भी अतिथि या प्रवक्ता बात कर रहे हैं वो उनके खुद की विचारधारा हैं भारत मेरे साथ चैंनल उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का प्रसंग !
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