दलीप लांगू के परिवार ने संगीत में क्या क्या योगदान किया है ?
दलीप लांगू का जन्म बैरियर बाला श्रीनगर में हुआ है। जो गणपतिहार के बिल्कुल नजदीक है। बैरियर यानि हेनसॉग के रइटिंग्स में लिखा हुआ है। कि वो जब कश्मीर आये थे । तो बृहद विहार में ठहरे थे और बृहद विहार ही बैरियर है अब जो थोड़ा ऊँचा जो घाट है वितस्ता झेलम के तो उनसे थोड़ा उंचाईं पर स्थित एक क्षेत्र जो गणपतिहार, बैरियर, बसंत बाग ये सब ऊंचाई पर स्थित हैं। लेकिन जब झेलम में बाढ़ आती थी तो सभी पानी पर डूब जाते थे क्षेत्र लेकिन बैरियर नहीं डूबता था और यहाँ पर लालदत्त केंद्र भी है। तो ये बैरियर एक संस्कृति का एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे महान पेंटर , महान म्यूजिशियन , महान ओमकार नाथ रैना और भट्ट साहब जैसे लोग हुए। और वहीँ श्री लांगू जी के परिवार में मैं दलीप लांगू भी पैदा हुआ। जब हम छोटे तबसे हमारे संस्करों में जो संगीत आया है वो हमारे माता पिता से आया है। पिता जी बांसुरी बजाते थे और चाचा जी भी संगीत में रूचि रखते थे जो बाद में गुरु बन कर पंडित कृष्ण लांगू जी ने संगीत की शिक्षा दी। क्युकी जब छोटे थे दलीप लांगू जी तो संगीत की तरफ रूचि रखते थे ये इनके चाचा देखते थे तो उन्होंने इन्हे संगीत सीखने लगे। और 1973 में पहली बार जब टैगौर हॉल लेकर गए और वहां पर दलीप लांगू जी ने अपना पहला संगीत रिकॉर्ड किया फिर इसके बाद से ही संगीत की यात्रा शुरू होगयी। फिर दलीप लांगू जे १४१ भाषाओँ में संगीत का अध्यन किया और बड़े बड़े मंचो में प्रस्तुति भी संगीत की दी।।
सभी राज्यों के लोक संगीत में बहुत ज्यादा वेस्टनईजेशन हो रहा है तो कश्मीरी संगीत और संस्कृति पर क्या असर पड़ा है ?
संगीत में एक परिवर्तन आये है जो कश्मीर से निकर कर बहार आए लोग उनमे जिसको जैसा मौका मिलता रहा जैसे की मुझे मौका मिला तो मैंने भी क्रिएट किया। मगर अक्सर जितने भी लोग हैं। वो पुराने ही संगीत को रीपीट करते रहते हैं। और जो नई पीढ़ी है उनमे 99% ऐसे गायक है जो पुराने गानों को दुबारा से नए पैटर्न पर गा रहे हैं। तो उससे क्या है कि कश्मीरी संगीत में जुड़ कुछ भी नहीं रहा है। कश्मीर में अभी यही हाल है। वही हसन सोफी, विजय मल्हा, कैलाश मेहरा, श्री महादेव इन सब के गाने दुबारा से गाये जा रहे हैं। इसको लेकर दो बातें हैं। या तो सीख नहीं रहे है। लोग या सिखाने वाले लोग तक उनकी पहुँच नहीं है। मतलब कुछ तो है। और कम्युनिकेशन गैप है कि वो अपना जो पोट्री पार्ट है। उनको गलत से प्रोनोन्स करना उसमे त्रुटि रखना, गलत से गाना या उस कविता के भाव को समझना ही नहीं और उस पर एक्ट करना। तो ये सब चीजे हुयी हैं। जो संगीत और संस्कृति को प्रभावित करती हैं।
कश्मीर का हुकुस बुकुस क्या है?
हुकुस बुकुस में एक भेद ये भी है कि ये वास्तविकता में ये पूरे कश्मीर का है ही नहीं। हुकुस-बुकुस कश्मीर के पंडितों के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है। जब बचपन में इसको बुजुर्ग सिखाते थे तो बताते थे कि ये कश्मीर में शिवरात्रि कि परम्परा है। और ये हुकुस बुकुस गुलाम रसूल संतोष ने इसको री राइट करके लिखा है। ये हुकुस बुकुस नहीं था ये ओकुस बोकुस था और इन्होने ओकुस बोकुस को रिजेक्ट किया था। हुकुस बुकुस और ओकुस बोकुस ये संतोष जी और पंडित भजन सोपुरी इसके इनोवेटिव अस्फ़ेक्ट है इस गाने के।।
और अब ये प्रचार भी हो रहा है कि ये ललवाक है जबकि ये अलवाक है ही नहीं ललवाक कि भाषा बिल्कुल अलग है और ओकुस बोकुस कि भाषा अलग है। और ये एक व्रइम है ये वाक् नहीं है ये व्रइम बच्चों के लिए की गयी थी। और इसे शिवरात्रि के जो १५ दिन होते थे। उसमे बच्चों को एंगेज किया जाता था इस काम में। एक तो वो कौड़ियों से खेलते और दूसरा ओकुस बोकुस खेलते थे। लेकिन आज इसकी बात ही नहीं कोई करता है।
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