विषय:- तंत्र विज्ञान और आध्यात्मिकता पर विमर्श
सीरीज़:- live // #NO Filter
अतिथि:- आचार्य जितेंद्र जी
एपिसोड:- 1st
शीर्षक:- तंत्र विमर्श और आध्यात्मिकता
जब हम तंत्र की बात करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में हमेशा से एक नकारात्मक की ऊर्जा आती है।और हम ये सोचते हैं कि तंत्र केवल एक वसीकरण है या काला जादू है। लेकिन तंत्र एक विज्ञान है।जिसे समझने के लिए हमने इस विमर्श को चुना है।और इस विषय पर चर्चा करेंगे। भारत मेरे साथ चैनल से सुरभि सप्रू और वाराणसी उत्तरप्रदेश से आचार्य जितेंद्र जी।और यह तंत्र विज्ञान को आध्यात्मिकता से जोड़ेंगे। क्योंकि भारत में तंत्र की जो परंपरा है, यह बहुत ही प्राचीन समय से ये पद्धतियों से परंपरा चलती आ रही है।और इसे समझना समझाना दोनों ही हमारा कर्तव्य है क्योंकि बहुत सारे लोग इसके साधक नहीं होते और बहुत सारे लोग इस विद्या को गलत तरीके से प्रयोग करते और गलत साधना के रूप में इस विद्या को विकसित करते।
तंत्र, मंत्र और यंत्र विज्ञान।
ये जो परंपरा है प्राचीन अत प्राचीन परंपरा है और जो तंत्र की परंपरा है तो बहुत ही विशिष्ट परंपरा है। तंत्र की परंपरा साधना से आरंभ होती है। मंत्र की परंपरा, क्रिया या जप करने से आरंभ होती है।जो की।हम अपने शरीर को नाम रट से लगाते हैं, वो मंत्र, परंपरा और मंत्र से दैव विज्ञान का जो संबंध है जैसे हम लोग मंत्रों से देवताओं का आराधना करते हैं और यंत्र विज्ञान है। तो तंत्र जहाँ विशिष्ट हो जाता है जैसे तीन पक्ष जो तंत्र, मंत्र और यंत्र ! इन तीनों में जो अग्रसर होता है, जो हम को परंपरा से मिलाता है, जैसे कि मंत्र हमको परंपरा से मिलाता है तो उस मंत्र के बाद में उसके जो हम लोग शरीर का निर्माण करते हैं वह यंत्र है।और यंत्र का जब हम निर्माण होता है तो उसको प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं।
परंपरा के अनुसार तंत्र क्या है? और यह कितना प्राचीन है?
परंपरा के अनुसार जो तंत्र की विद्या है वह विश्व कल्याण के लिए है। जैसे कि हम मूलता देखें कि सौर परंपरा है? इसमें उपासक सूर्य की उपासना करते हैं, क्योंकि सूर्य जगत को किरण देता है। सूर्य मे ही ऐसी ऊर्जा है जो कि मनुष्य के शरीर को प्रस्फुटिक करता है, उसमें अग्नि का समावेश करता है। ये सूर्य का ही है। नेत्र में भी दक्षिण नेत्र हम लोगोंके है। वो सूर्य के प्रभावित है।नाशिका से प्रभावित है। इसलिए सूर्य की उपासना करने वाले यही सूर्य से प्रार्थना करते हैं कि इस जगत को संम्रति सब कुछ मिलता रहे और विश्व का कल्याण होता रहे।
अघोर परंपरा?
आप शिव परंपरा देखें तो इस परंपरा में ही अघोर आता है।गाणपत्य में भी अघोर आता है और शप्त परंपरा है उसमें भी अब हो रहा है। कौल परंपरा में भी अघोर है।अघोर वामाचार को कहते हैं।वामाचार का मतलब ये है कि वाम भाग में जो भगवती शक्ति उपस्थित हैं उस शक्ति का आप ध्यान करे उस शक्ति को अपने शरीर में उस वामाचार के भाव से देखना है लेकिन अघोर भेद नहीं करता है।तुम सह समर्पण है और सब स्वीकार ह। ये अघोर का भाव है। अघोर, शिव और भगवती के चरणों में ही समर्पित हो जाने का नाम अघोर है।
भारत मेरे साथ चैनल के माध्यम से भारत मेरे साथ चैनल से सुरभि सप्रू और वाराणसी से आचार्य जितेंद्र जी के पूरे विषय तंत्र विज्ञान और आध्यात्मिकता को समझने और जानने के लिए भारत मेरे साथ चैनल का लिंक नीचे गया है उसे क्लिक करें।
Note: – शो पर बोली गयी कोई भी बात चैनल के द्वारा लिखित नहीं है जो भी अतिथि या प्रवक्ता बात कर रहे हैं वो उनके खुद की विचारधारा हैं भारत मेरे साथ चैंनल उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।




