सीरीज़:- सही क्या है ?
विषय:- धनुर्विधा
अतिथि:- श्री यल सुब्बाराव जी विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश
स्थान:- श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर दिल्ली
शीर्षक:- नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल की सीरीज़ सही क्या है ? में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। और सही क्या है ? सीरीज़ में भारत मेरे साथ चैनल धर्म, संस्क्रीत, सनातन, इत्यादि को लेकर सभी लोगों से चर्चा करते हैं। और सनातन से जुडी कई सारी बातें हैं। तो उस विषय पर बातचीत करते हैं। इस सीरीज़ में लगातार बहुत सारे संत, महंतों, आचार्य, विद्वानों से हम आपको मिलते हैं साथ ही कई मंदिरों और धरोहर को भी दिखते हैं। तो आज मेरे साथ में आंध्रप्रदेश विजयवाड़ा से एक विशेष मेहमान हैं जिनका नाम है श्री यल सुब्बाराव और इनकी जो विधा है वो प्राचीन धनुर्विधा है और इस विषा में इन्होने महारत हासिल की है। इनको कह सकते हैं कलयुग के द्रोणाचार्य !
यदि आपको महाभारत के द्रोणाचार्य को देखना और समझना है तो आप यल सुब्बाराव जी से मिले और भारत मेरे साथ चैनल के माध्यम से भी इनकी विधा को भी देख सकते हैं।



प्रश्न:- एल सुब्बाराव धनुर्विधा किस्से और क्यों सीखा ?
उत्तर:- एल सुब्बाराव ने धनुर्विधा अपने गुरु जो इनके पिता हैं उनसे ही सीखा था और इन्होने शिक्षा बी कॉम डिग्री भी हासिल की है। इनके पिता भी धनुर्विधा में निपुण थे और हमेशा धनुर्विधा की सभी जगह प्रस्तुति करते रहे हैं उनके साथ में एल सुब्बाराव जी उनके सहयोग में जाते थे। तभी इनके पिता ने कहा था कि तुम मेरी इस धनुर्विधा को हमेशा जीवित रखो गे। और तभी से इन्होने अपने मन में प्रतिज्ञा लेली कि इस विधा को पूरे जीवन जीवांत रखेंगे और अब ये सभी जगह जगह जा कर इस विधा का प्रदर्शन कर रहे हैं।
प्रश्न:- धनुर्विधा के महत्वपूर्ण स्वरुप क्या क्या हैं ?
उत्तर:- यह धनुर्विधा हमारे प्राचीन ग्रंथो में हैं द्रोणाचार्य जी ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन और कौरव पांडव को सिखाया था। ये यजुर्वेद का उपवेद है धनुर्विधा ! ये धनुर्विधा से हम ये विधा ग्रहण कर सकते हैं। धनुर्विधा को सिखने या करने के लिए सबसे पहले एकाग्रता (संकेन्द्र )करना बहुत ही जरूरी है। एकाग्रता करने के लिए प्रत्येक दिन योगासन और ध्यानक्रिया का अभ्यास करना भी जरूरी है। इसके द्वारा हम एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं उसके द्वारा ये धनुर्विधा को सभी जगह वेदन करने के लिए अवसर हमको प्राप्त होगा। और वेदन के लिए धनुर्वेद में हमको मिलेगा ये स्थिर लक्ष्य, चर लक्ष्य, चराचर लक्ष्य, चारद्वय मय लक्ष्य। ये चर तरह के लक्ष्य वेदन है।
वो चार तरफ के लक्ष्य वेदन को हम भेदन कर सकते हैं। और लक्ष्य भेदन तीन प्रकार के हैं।
१:- चक्षु ग्राह लक्ष्य भेदन
२:- मनो शब्द ग्राह लक्ष्य भेदन
३:- मनोग्राह लक्ष्य भेदन




