विषय:- शास्त्रानुसार भक्ति से जुडी बातें
सीरीज:- सही क्या है ?
अतिथि:- लक्ष्मी नरसिंहा प्रभु इस्कॉन मंदिर दिल्ली
स्थान:- भारत मेरे साथ स्टूडियो ईस्ट दिल्ली
शीर्षक:- नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल के सही क्या है सीरीज़ में आप सभी दर्शकों का स्वागतः है।आज का विषय है कि कृष्ण योग, अनुशासन, भक्ति मार्ग और सही सनातन की पद्धति के साथ साथ इस्कॉन मंदिर के संरक्षक श्री प्रभु पाद जी के विषय में भरता मेरे साथ चैनल की संचालिका सुश्री सुरभि सप्रू जी इस्कॉन मंदिर दिल्ली के भक्त लक्ष्मी नरसिंहा प्रभु जी से।
इस सही क्या है ? कि सीरीज में सुश्री सुरभि सप्रू जी लक्ष्मी नरसिंहा प्रभु से बात करेंगी कि सनातन धर्म में अनुशासन, गीता, कृष्ण योग, और शास्त्रानुसार सन्यास क्या है ? किस प्रकार से भगवान से जुड़ सकते हैं इन सभी विषय पर आज विशेष बातचीत भारत मेरे साथ चैनल के माध्यम से आप को देखने और सुनने को मिले गी।
प्रश्न:- सही सनातन की पद्धति क्या है ?
उत्तर:- सनातन धर्म के विषय में जो है। शास्त्र में वर्णन किया गया है। श्रीमद भगवत में वर्णन आता है। कि धर्म किसे कहते हैं। “धर्म साक्षात् भगवत प्राणितं ” भगवान के द्वारा बनाया गया नियम इसको धर्म कहते हैं। और धर्म को कहते हैं।
” स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा संप्रसीदति।।
भगवान के प्रति प्रेम का होना यही वास्तविक सनातन धर्म है जब भगवान के प्रति प्रेम होगा तो जो उनके पुत्र है सभी लोगो के प्रति अपने आप प्रेम होगा। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है।
ममैंवाशो जीव लोके, जीव भूतः सनातनः “” इस संसार में जितने भी प्राणी हैं वो सब मेरे अंश हैं और
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रम् ओंकार ऋक् साम यजुरेव च॥
मैं ही सबका माता हूँ मैं ही सबका पिता हूँ। तो सनातन धर्म का मूल उद्देश्य है भगवान से प्रेम करना और हमारा सनातन धर्म इतना विशाल है कि यहाँ पर केवल मनुष्यों से प्रेम करना नहीं पशु पक्षी से भी प्रेम करना सिखाया जाता है और सनातन धर्म के अंदर मच्छर, खटमल, सांप विच्छू इनको भी मरना पाप माना गया है। इसीलिए तो गीता में कहा गया है कि “अहिंसा परमो धर्म: ” हिंसा नहीं करना है। इसको पाप बोला गया है कि सबसे प्रेम करना यह सनातन धर्मं सिखाता है। इसीलिए सनातन का अर्थ होता है जो हमेशा था और हमेशा रहे गा। इसीलिए आत्मा का सनातन धर्म क्या है परमात्मा से प्रेम करना यही वास्तव में सनातन धर्म है। ……………।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।


प्रश्न:- सनातन धर्म के साथ अनुशासन कितना महत्वपूर्ण है ?
उत्तर:- इस संसार में जब हम कोई भी वास्तु या शिक्षा को प्राप्त करते हैं तो अनुशासित होना बहुत ही जरुरी है इसी प्रकार जहाँ भगवान और आध्यात्मिकता की बात है तो बिना अनुशासित हुए कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता है। इसीलिए तो गोस्वामी जी कहते हैं।
“वाचो वेगम, मनसा क्रोधवेगम, जीवा वेगम, उदर उपस्थ वेगम।
एतान वेगान यो विशेहेत, धीरा सर्वम अपीमाम प्रित्वीम चशिश्याद।”
जिसने वाणी के वेग को साध लिया यानि जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया।
ऐसा व्यक्ति सम्पूर्ण पृथ्वी लोक में गुरु बनने योग्य है सबको अपना शिष्य बना सकता है। और वही व्यक्ति आध्यत्मिक मार्ग में आगे बढ़ सकता है। “अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः।
जनसङ्गश्च लौल्यं च षड्भिर्योगो विनश्यति॥
इसी में इस्कॉन मंदिर में तो महा प्रभुपाद जी ने बहुत कठोर नियम दिए हैं हम लोग भारत के अन्य मंदिरो में जाते हैं वहां पर नियम देखने को नहीं मिलते हैं और मंदिर भी प्राचीन और उनकी महिमा भी उनकी बहुत होती है पूजा पाठ भी बड़े नियम संयम से होता है लेकिन समय ऐसी चीज़े देखने को मिल जाती हैं जो पूरे नियम को खंडित करती हुयी दिखाई देती हैं।

प्रश्न:- सनातन धर्म में शास्त्रानुसार सन्यास किसे कहते हैं ?
उत्तर:- हमारे शास्त्रों में जो है उसमे 108 प्रकार के सन्यासियों के नाम दिए गए हैं। और सन्यास का जो वास्तविक है वो अर्थ, मन, वाणी और शरीर के द्वारा भगवान को समर्पित होना यही सन्यास है। और वो कोई भी हो सकता है चाहे गृहस्थ में रहे या वन में रहे या कहीं भी रहे। जो अपने मन वाणी शरीर के द्वारा सम्पूर्ण रूप से भगवान का चिंतन क्र रहे हैं भगवान को समर्पित है ऐसा व्यक्ति वास्तविक रूप से सन्यासी है।
प्रश्न:- कृष्ण का योग क्या है ?
उत्तर:- गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग आष्टांग योग ध्यान योग इत्यादि का वर्णन किया है बड़े विस्तार से और एक होता है शारीरिक व्यायाम शरीर को फिट रखने के लिए इसे व्यायाम कहते हैं योग नहीं है योग का अर्थ होता है जुड़ना और योग कई प्रकार के हैं उनमे से भगवान कृष्ण ने गीता में इतने प्रकार के योगों का वर्णन किया।
कर्म, ज्ञान, भक्ति, आष्टांग इत्यादि योग का वर्णन करने के बाद भी भगवान कृष्ण ने अपना निष्कर्ष बताया कि मेरे अनुसार सर्वश्रेठ योग क्या है?
भगवान कृष्णा कहते हैं गीता के पांचवे अध्याय में
योगिनामपि सर्वेषां मद् गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
योगी नाम सभी योगियों में श्रद्धा पूर्वक जो मेरा भजन करता है वो योगी सर्वश्रेष्ठ है।




