Monday, January 26, 2026
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कैसा है ? लोक का रंगमंच:- रोशनी प्रसाद मिश्र

रोशनी प्रसाद मिश्र – रोशनी प्रसाद मिश्र का जन्म ०१ अप्रैल १९८५ को जिला सीधी मध्यप्रदेश के खैरागांव में हुआ । आपकी रंगमंचीय शुरूआत 2003 में गुरू श्री अशोक तिवारी के साथ हुई तदुपरांत खैरागढ़ विश्वविद्यालय से रंगमंच में एम.ए., लोक संगीत में एम.ए. द्विवर्षीय सुगम संगीत, डिप्लोमा गीतांजलि सीनियर की शिक्षा के बाद सीधी वापस आकर अवधेश प्रताप सिंह विश्व विद्यालय रीवा से एम. एस. डब्ल्यू की पढ़ाई भी पूर्ण की। देश के कई विख्यात रंग निर्देशकों के सानिध्य में रहकर अब तक 30 नाटकों में अभिनय । आपने कई राष्ट्रीय नाट्य कार्यशालाओं का निर्देशन किया है जिसमें ग्राम नाट्य कार्यशालाएं प्रमुख हैं | ग्राम नाट्य कार्यशाला की शुरूआत कर आपने सीधी रंगमंच के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया है । सीधी के 365 ग्रामों में लोककला ग्राम की स्थापना कर लोककला संरक्षण के लिए विशेष पहल । गड्ढा, हवालात, सम्राट अशोक, हंसिनी, रामलीला, इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, सम्राट, पागल घर, कैसे करें ऐतबार, लतमरबा, सच बड़ा बलवान, आपके कर कमलों से, कर्णभारम, धरती आबा, सबूत, निराला, कौआ चला हंस की चाल, चंदनुआ, चिरकुमारी, फंदी, पंच परमेश्वर, अन्नदाता की आखत, मेरे बापू, स्वर्णिम मध्यप्रदेश, अमृत मध्यप्रदेश, तीन सयाने, चरणदास चोर, बंका बैगा, उजबक राजा तीन डकैत, मातृत्व, स्याही के रंग, शब्दों की नाव,भक्त आनंद,नूरमहल आदि नाटकों का निर्देशन किया।
सम्मान : रंगमंच लोक कला एवं सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए युवा सम्मान सीधी 2010-11, युवा नाट्य निर्देशक सम्मान इफ्टा कोलकाता 2015- 16,दैनिक जागरण कला सम्मान सीधी 2016-17, दैनिक जागरण विंध्य शिखर सम्मान रीवा 2016-17, हिन्दी भाषा एवं रंगकर्म की सुंदीर्घ सेवा हेतु बांधव शिखर सम्मान उमरिया 2017-18, बघेली रंगमंच के विशेष योगदान के लिए ओम रंग सम्मान छिन्दवाड़ा 2017-18, लोक कलाओं के उत्थान हेतु बाणभट्ट लोक कला सम्मान 2018-19, अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज मध्यप्रदेश द्वारा रंगमंच एवं लोक कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरोधा सम्मान 2020-21,विंध्य के क्रांतिकारियों पर नाट्य लेखन एवं निर्देशन के लिए पं.रणजीत रॉय दीक्षित शहीद सम्मान डभौरा 2022- 23, साहित्य और रंगमंच में विशेष कार्य हेतु सिल्वर जुब्ली सम्मान 2023-24,रंगमंच के माध्यम से महिला सशक्तिकरण के लिए उत्कृष्ट कार्य हेतु विश्व महिला सम्मान 2024-25, रंगमंच एवं लोक कला के माध्यम से बघेली बोली के उत्थान हेतु विंध्य बघेली ममत्व सम्मान 2025 आदि सम्मान से सम्मानित किया गया।
विशेष उपलब्धि : जूनियर रिसर्च फेलोशिप अवार्ड,(सी.सी.आर.टी. नई दिल्ली 2016-17)
बतौर अभिनेता,निर्देशक,नाटककार, संगीतकार एवं लोक कला विशेषज्ञ भारत रंग महोत्सव, ओलम्पिक थिएटर, मिनेरवा थिएटर फेस्टिवल, आदिरंगम, आदिपर्व,देशज सहित कई राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय नाट्य महोत्सवों में भागीदारी की | वर्तमान में नाट्य लेखन,निर्देशन, अभिनय, संगीत व लोक कलाओं के शोध कार्य में सतत सक्रिय

प्रश्न:- लोकनाट्य और पराम्परिक रंगमंच के नाटकों में क्या अंतर है ?
उत्तर:- लोक नाट्य और पराम्परिक रंगमंच लगभग समान ही है। पराम्परिक नाटक ये है कि पारम्परिक वो है जो परम्परा अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। इसको हम अनुष्ठिक लोकनाट्य भी कह सकते है। लेकिन ये तीनो एक ही चीज हैं जो परम्परागत से चल रही हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी जैसे पहले हमारे पूर्वजों ने किया फिर उसी नाटक को हम कर रहे हैं फिर आगे आने वाली पीढ़ी करती रहे गी।। लेकिन यह लिखित परम्परा में नहीं होती है। ये मौखिक परम्परा में { जैसे जब हमसे नयी पीढ़ी सीखती है तो वो क्या करते हैं कि अभ्यास के समय सभी पात्र एक दूसरे के संवाद याद करते हैं।। और इसमें कोई निर्देशक नहीं होता है इसमें सूत्रधार होता है वही पूरे नाटक को आगे लेकर जाता है।। जो लोकनाट्य पराम्परिक में अभी भी कोई निर्देशक और लेखक नहीं होता है।।


प्रश्न:- जब आप बघेली भाषा में नाटक लिखते हैं ? तो उसमे भाषा शैली कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर:- बघेली भाषा में तो लिखने में बहोत ही कठिनाई आती है उसका कारण ये है कि जैसे हिंदी हम बोलते हैं वही लिखते हैं लेकिन बघेली भाषा में ये समस्या है कि आप बोलेंगे कुछ और लिखेंगे कुछ क्यूंकि जो बोलते हैं वो लिखने के शब्द ही नहीं है बघेली में। और न तो आपको कंप्यूटर में कहीं भी नहीं मिले गें।। और बघेली भाषा कई तरह से बोली जाती है जैसे कि हमारे बघेलखण्ड की कहावत है कि—
” कोस कोस में पानी बदले और चार कोस में वाणी “
लेकिन ये खास बात है कि बघेलखण्ड में कि हम बघेली में जो नाटक करते हैं तो पात्र और उसके चरित्र के अनुसार संवाद भी लिखा जाता है।।
प्रश्न:- आदिवासियों के साथ जो रंगमंच करते हैं। तो नाटक करते समय चुनौतियां क्या क्या आती हैं ?
उत्तर:- आदिवासियों के साथ काम करने में सबसे ज्यादा कठिनाई तो ये हो जाती है कि आप जब किसी आदिवासी के पास जा रहें हैं और अगर वो आपको नहीं पहचानता है तो वो सबसे पहले अपनी कला और विधा को बताये गा ही नहीं कि उसको कुछ भी आता है।। जैसे हम लोग जाते हैं खोजने के लिए तो पता चला कि एक गांव है सिरसी वहां पर कोई यादव रहता है और वो चांदनी गाते हैं। वो और भी बहुत सारी गाथाएं गाते हैं और जब उस गांव में पहुंचे किसी तरह से और वहां के लोगो से पूछा कि रामप्रसाद यादव से मिलना है तो उनको सभी लोगो ने बोला की इनको तो हम जानते ही नहीं है बड़ी देर बाद एक लोगो ने बताया की उनका नाम आभा बाबा है इस नाम से सभी लोग जानते हैं उन्हें।।
फिर उनके पास गए और उनकी गाथा और विधाओं के विषय में बात की तो उन्होंने पहले साफ मना कर दिया की मुझे तो आता ही नहीं कुछ भी वो फिर किसी दूसरे का नाम बताने लगे की वो गाते हैं ये सब फिर बड़ी मुश्किल के बाद आभा बाबा ने बताया की उन्हें आल्हा की 52 गाथाएं आती हैं और भी लोक की जो गाथाएं हैं उनको पता हैं और उन सभी गाथाओं को गाते भी हैं।।
आभा बाबा की एक गाथा बहुत ही प्रसिद्ध हैं चंदनुवा !
ये एक राजा की बेटी और यादव चरवाह की प्रेम पर आधारित हैं इसमें राजा की बेटी अपना प्रेम यादव चन्दन से किस तरह से बयान कर रही हैं।। इसकी कुछ पंक्ति —
” सोलह बारिस मोरी होई गये उमरिया गिनत गिनत दिन गये बीती।
के हाँ चन्दन गिनत गिनत दिन गये बीती।।
मानी ले हमरो कहंवा रे चन्दन हमसे लगाई ले प्रीति “

इसी तरह से कोई भी आदिवासी अपनी कला गाथाये विधाये नहीं बताते हैं लेकिन वो ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं।।


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