Monday, January 26, 2026
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शारदा लिपि का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है ?

नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। आज बात करेंगे ऐसी लिपि पर जो कई शताब्दी पूर्व की है लेकिन आज वो धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है ये लिपि कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, पंजाब, इतय्दी राज्यों में पायी जाती थी। लेकिन आज उसका इतिहास कुछ पन्नो में सिमट का रह गया है फिर भी कश्मीर के पंडित समाज अभी भी अपने पत्रिका, पंचांग इतय्दी में इस लिपि का प्रयोग में लाते हैं। इस लिपि का नाम है। शारदा लिपि………।
आपको पता होगा की शारदा लिपि का इतिहास तो बहुत बड़ा है। क्यूंकि हम लोगो देखतें हैं। तो ब्राह्मी लिपि के बाद किस तरह से कुटिल लिपि और कुटिल लिपि के बाद शारदा लिपि आती है। और शारदा लिपिवैसे तो नवमी दंसवी शताब्दी के उसमे से कहते हैं। क्यूंकि गौरी शंकर हिरा चन्द ओझा जी ने एक सराहा के लेख के आधार पर उन्होंने दंसवी शताब्दी बताया है। लेकिन इसके साथ साथ हमे कई ऐसे प्रमाण मिले हैं। कि जो शारदा लिपि तीसरी और पांचवी शताब्दी से है।
जैसे कि गिलगिट और बक्षाली पाण्डुलिपि या बख्शाली पाण्डुलिपि है। तो गिलगिट तो पांचवी शताब्दी की बताई जाती है और बख्शाली पाण्डुलिपि तीसरी शताब्दी की मानी जाती है। तो इस लिए लगभग तीसरी शताब्दी से हम शारदा लिपि का उद्धभव मान सकते हैं। अब ये है कि जो बख्शाली पाण्डुलिपि है। वो तो शारदा लिपि के समीप की है। जो भी हो पर बक्षाली पाण्डुलिपि या बख्शाली पाण्डुलिपि तीसरी शताब्दी से है तो हम ये कह सकते हैं। कि शारदा देवनगरी से भी पहले से सिद्ध हो जाती है। तो इस तरह से शारदा लिपि कि अब एक बात और भी है।
कि शारदा लिपि को सिद्धम भी कहते हैं। क्यूंकि जैसे अक्षर आरंभ के समय पर ॐ नमः सिद्धम लिखने की परम्परा है। ये शब्द मंगलवाचक होते हैं। किसी काम को हम आरम्भ करते हैं तो मंगल से करते हैं। इसी दृष्टि से कुछ लोग सिद्धम कहते हैं। लेकिन सिद्धम की कई वो चल रही हैं। कि एक तो उत्तर लिच्छवी जो नेपाल कि लिपि है। उसे भी सिद्धम कहते हैं। और नेपाल कि इसी तरह से पांच लिपियाँ रही हैं धीरे धीरे सभी लिपियाँ लिप्त हो गयी हैं अब देव नगरी पर काम कर रही है। वैसे ही कश्मीर कि शारदा लिपि लुप्त सी हो गयी है।

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