विषय:- राजस्थानी मांड गायकों के साथ सुंदर राजस्थानी लोकगीत और परम्परा !
अतिथि:- करन संग समूह
शीर्षक:- नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल की सीरीज़ म्यूजिक टेल्स में आप सभी दर्शकों का हार्दिक स्वागत है। आज म्यूजिक टेल्स सीरीज़ में जो मेहमान आये हुए हैं वो राजस्थान चूरू से करन और उनके साथी बंधु हैं। ये सभी कलाकार लोक गीतों में महारथ हासिल की हुयी है। और ये कलाकार अपनी परम्परा को लेकर देश के कोने कोने में अपनी आवाज़ देकर राजस्थानी लोकगीतों की प्रस्तुति करते रहते हैं। आज करन जी अपने साथियों के साथ भारत की राजधानी दिल्ली में भारत मेरे साथ चेंनल में अपनी प्रस्तुति देरहे हैं। भारत मेरे साथ चैनल के सभी दरशगकों के लिए राजस्थानी लोक परम्परा लोकगीत से स्वागत करते हैं।
गीत की पंक्ति………
केसरिया बालमा… आवो नी, पधारो म्हारे देस
मारू थारे देस में निपजे तीन रतन-
एक ढोला, दूजी मारुवन, तीजो कसूमल रंग
केसर सू पग ला धोवती, घरे पधारो जी..
राजस्थानी लोक गीतों की विशेषता क्या है ?
देश के सभी राज्यों के लोकगीतों के अपेक्षा राजस्थान के लोकगीतों का अपना अलग ही रुझान है। राजस्थान लोकगीतों में इसके लोक गीतों के गायन के लिए जो धुन का प्रयोग किया जाता है उस वाद्ययंत्र को ये कलाकार घरों में अपने हांथो से बनाते हैं राजस्थान का जो प्रमुख वाद्ययंत्र है जिसको अब सारंगी कहते हैं इसको राजस्थान में ‘रावण हत्था’ भी कहते हैं। इसको बनाने के लिए इस वाद्य यंत्र को धनुष जैसी मींड़ और लगभग डेढ़-दो इंच व्यास वाले बाँस से बनाया जाता है।
एक अधकटी सूखी लौकी या नारियल के खोल पर पशुचर्म अथवा साँप के केंचुली को मँढ़ कर एक से चार संख्या में तार खींच कर बाँस के लगभग समानान्तर बाँधे जाते हैं।
और इस वाद्ययंत्र के साथ में खड़ताल और ढोलक इत्यादि वाद्य यंत्र होते हैं।
नोट:= भारत मेरे साथ चैनल से सुश्री सुरभि सप्रू जी और राजस्थान चूरू से करन और उनके साथियों के द्वारा राजस्थान की लोक परम्परा लोकगीत को सुनने के लिए नीचे दिए गए भारत मेरे साथ चैनल के लिंक को क्लिक करे और चैनल को लाइक, शेयर, सब्सक्राइब, और कमैंट्स जरूर करें।




