Monday, January 26, 2026
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रंगमंच ,सिनेमा ,लोक संस्कृति और संघर्ष पर चर्चा रंगकर्मी नीरज कुंदेर सीधी |

नमस्कर भारत मेरे साथ चैनल में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। आज बात करेंगे भरत मुनि के समय के नाटकों से लेकर आज के नाटकों तक के सफर की।। कि किस तरह से रंगमच धीरे धीरे चुनौतिय पूर्ण बनता जा रहा है आज के समय में कोई रंगमंच नहीं करना चाहता है पर कलाकार सभी बनाना चाहते है। इन सभी बातों पर आज चर्चा करेंगे सीधी मध्य प्रदेश के रंगकर्मी निर्देशक नीरज कुंदेर जी से। पहले उनके जीवन के बारे में बताते हैं कि नीरज कुंदेर जी का जन्म १०अप्रैल १९८६,को सीधी मध्यप्रदेश में हुआ । गुरू आनंद मिश्र के साथ आपकी रंगयात्रा का आरम्भ हुआ | वर्ष २००६ में संगीत नाटक अकादमी की प्रथम कार्यशाला में भाग लेने के बाद संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से केरल में पद्मश्री कावालम नारायण पणिक्कर जी के साथ कार्य कर संस्कृत व लोक नाटकों की बारीकियों का अध्ययन किया । प्रशिक्षणोंपरांत कई नाटृय कार्यशालाओं का निर्देशन । होरी, कर्णभारम, लतमरबा, काल-कोठरी, तैय्या-तैय्यम, ठाकुर रणमत सिंह, चमड़े की नाव, १८५७ की क्रान्ती, आत्मजा वृत्तान्त, दादरपुर के बच्चे, काबुली वाला, आपके कर कमलों से, सच बड़ा बलवान, रेलवे एनकाउन्टर, पंचभगत, शिव विवाह, मथानी लोहार आदि नाटकों का निर्देशन | आपने सीधी जिले की लोककलाओं के संरक्षण-संर्वधन हेतु २२१ लोककला ग्रामों का निर्माण एवं विलुप्त होती कई लोककलाओं को दस्तावेजित एवं पुनर्प्रयोग में लाने का सराहनीय कार्य किया है | वर्तमान में लेखन, निर्देशन व लोककला के कार्य में सतत सक्रिय ।

प्रश्न:- वर्तमान समय में रंगमच में क्या क्या चुनौतियाँ हैं ?
उत्तर:- आज के समय में भी बहुत साडी चीजें ऐसी हैं किलोग अपडेट नहीं हुए हैं जिनकी वजह से परेशानी होती है अगर अपडेट होंगे तो निश्चित तौर पर सरवाईव कर पाएं गें। सबसे बड़ी समस्या ये है कि ये लाइव आर्ट फॉम है। मतलब ये स्टेज पर होता है और दर्शक सामने से देखतें हैं। जब टीवी इंड्रस्ट्री आयी तो धीरे धीरे जो बड़े बड़े रंगमच करने वाले समूह थे जो फोक स्टाइल में काम करते थे। प्रोफेशनल भी फ़ारसी थियेटर भी हो गया या नौटंकी शैली हो गयी तो जैसे ही सिनेमा आया तो धीरे धीरे वो कलाकार वंहा चले गए तो वंहा पर उन कलाकार का पतन होना शुरू हुआ। अब कुछ लोग ही हैं। जो अभी भी करते हैं तो वही चीज जो मॉर्डन थियेटर के साथ हुआ बीच में एक लहार सी आयी कि मॉर्डन थेयटर 70 से 90 के दशक में खूब काम हुआ और लोग जुड़े काम करना शुरू किया लेकिन पिछले 10 से 15 सैलून से जो ये यूट्यूब और फेसबुक में कंटेंट क्रिएटर आ गए हैं। और कंटेंट के नाम पर कुछ भी दे रहा हैं तो सबसे बड़ी समस्या आज है कि कोई भी व्यक्ति आता है कुछ दिन रहता है और सीखता कुछ भी नहीं है। क्यूंकि सिखने का एक प्रोसेस होता है। एक समय तो लगता ही है और उसके बाद वो तुरंत चला जाता है और अपना काम करने लगता है। और वो कुछ भी कंटेंट सस्पेंस वाले बनाते हैं जिससे लोग देखें। और आज के समय में कोई भी रंगमंच के लिए रंगमंच नहीं करता है। बस वो थोड़ा सिखने लिए करता है और यूट्यूब फेसबुक में वीडियो बनाने लगता हैं कुछ कलाकार ने टीवी और सिनेमा घरों की तरफ जा कर काम करने लगे।। अब वही लोग रंगमच देख और कर रहे हैं जिनको शौक है।।

प्रश्न:- नीरज कुंदेर का रंगमच के लिए क्या संघर्ष रहा है ?

उत्तर:- यदि हम संघर्ष कहें तो सिर्फ मेरा ही नहीं पूरी दुनिया में जितने भी जीव, प्राणी, पशु पक्षी हैं सबके साथ संघर्ष है कोई भी बिना संघर्ष के नहीं रह सकता है। जब बच्चा पैदा होता है तो तब से संघर्ष करने लगता है। जन्म लेते ही साँस लेने से लेकर चलने का बोलने का रोने का सभी का संघर्ष है। और सुविधाएँ भी हैं जैसे मेरे साथ मेरे परिवार का माँ का पिता जी का सहारा मिलता रहा है आज जो भी हैं उन्ही के बजह से हैं।।

तब भी सहारा होने के बाद भी एक संघर्ष तो यह है कि हम किस तरीके से सीधी में थियेटर को खड़ा करें। क्योंकि सीधी में थियेटर होता था लेकिन तरीके से नहीं होता था क्योंकि वो लोग कभी कभार समय निकल कर करते थे लेकिन मेरा विचार था कि मैं पूरा जीवन रंगमंच करूंगा और फिर थियेटर करने इंदौर आ गया और थियटर करना शुरू कर दिया लेकिन हमेशा यही कहता था मैं कि पूरे जीवन भर रंगमच करूंगा। पर सभी दोस्त लोग यही कहने लगते कि कहते तो सब हैं लेकिन कुछ समय के बाद लौट जाते हैं। पर मैं संघर्ष करता रहा शुरुआत में हिंदी बोलने से लेकर सीधी में जाकर थियेटर में काम करने तक संघर्ष ही संघर्ष रहा है।।

रंगमंच और सिनेमा पर इस रोचक बातचीत को देखने के लिए दिए गए लिंक पर क्लीक करे और चैनल को सब्सक्राइब करें।

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