Monday, January 26, 2026
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मिथिला की संस्कृति, साहित्य, और स्त्रियों का सम्मान |

विषय:- मिथिला की संस्कृति, साहित्य, और स्त्रियों का सम्मान
अतिथि:- श्री पवन कुमार झा
स्थान:- भारत मेरे साथ स्टूडियो ईस्ट दिल्ली
शीर्षक:- नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल की कॉटैन क्रोनिकल्स सीरीज़ में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। इस सीरीज़ में बात करेंगी भारत मेरे साथ चैनल की संचालिका सुश्री सुरभि सप्रू जी मैथली नाटक के निर्देशक और रंगकर्मी श्री पवन कुमार झा जी से मिथिला की संस्कृति, धरोहर और मैथली भाषीय रंगमंच पर ! तो इस क्रॉटैन क्रोनिकल्स सीरीज़ में पवन कुमार झा अपने सांस्कृति क्षेत्र की बात करेंगे। और जब किसी भी व्यक्ति को अपने सांस्कृतिक क्षेत्र की बात बात करने का अवसर मिलता है तो मन बहुत ही उत्साह से भर जाता है। मैं पवन कुमार झा मिथिला का रहने वाला हूँ और मिथिला राजनितिक रूप से बिहार का उत्तरी भाग है इसमें लगभग 16 जिले जो हैं यानि की गंगा से भारत का मिथिला है और लगभग उतना ही या उससे थोड़ा सा कम क्षेत्रफल जो मिथिला है वो नेपाल देश में पड़ता है। हिमालय की तराई जहाँ से शुरू होती है वहां से लेकर गंगा तक ये सम्पूर्ण मिथिला है मिथिला का यदि परिचय दें तो मिथिला इस सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड में बुद्धिमता उपजाने वाला क्षेत्र है दूसरे क्षेत्र के खेतेओ में अनाज उपजते हैं लेकिन मिथिला की भूमि पर बुद्धि उपजती है। ये बातें उत्सुकता में नहीं कही जा रही हैं इसका परिणाम भी है तीन स्तर पर । शास्त्र, लोक,और तीसरा जो प्रायोगिक रूप से अभी चल रहा है।

प्रश्न:- कश्मीर का विस्थापन त्रासदी था लेकिन बिहार का विस्थापन क्या और क्यों?
उत्तर:- कश्मीर का विस्थापन त्रासदी है और मिथिला का विस्थापन इसमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि संस्कृति अपना स्वरुप बदलती है ख़त्म नहीं होती है। इसी में देखे तो जितने भी शास्त्र हैं हम चूँकि नाट्य क्षेत्र के लोग है तो नाट्यशास्त्र है तो कहा जाता है कि काल पात्र जितना हमे लिखना था उतने हमने लिख दिया बाकि काल पात्र और देश के हिसाब से स्थिति के हिसाब से चीजें तय होंगी तो इस तरह से संस्कृति परिवर्तित होती है । जैसे की मिथिला के बारे में कहा गया है कि उत्सवों का क्षेत्र है साल भर कुछ न कुछ उत्सव होता ही रहता है हमेशा अब उतना सारा उत्सव हम यहाँ दिल्ली मुंबई जैसे शहरों में तो नहीं मना सकते है। लेकिन हमारी मान्यता यह होनी चाहिए हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि हमारी संस्कृति का जो मूलमर्म है वो मर्म नहीं टूटना चाहिए। ……..।

प्रश्न:- मिथिला में स्त्रियों का महत्व बहुत अधिक था। क्या अभी भी है ?
उत्तर:- यदि हम द्वापर युग तक की बात करें या इस युग में भी पिछले ४००-५०० वर्ष चले जाएँ वहां तक तो हमारा जो समाज था उसे वो महिला डोमिनेट करती थी और इसके साथ बच्चों का नाम भी माँ के नाम से जाना जाता था। और मिथिला की एक परम्परा थी जिसे नियोग परम्परा कहते थे।
नियोग परम्परा यह थी कि यदि कोई व्यक्ति या परिवार चाहता था कि हमारे खंडन में बुद्धिमान बच्चा जन्म लें तो उसके लिए वो अपने परिवार की स्त्रियों का स्नसर्ग किसी बुद्धिमान से करवाते थे और वो जो बच्चा पैदा होता था उस बक्व्ही को अपने वंश में रख के वहां से वंश को बढ़ाती थी। और इसी प्रथा से मिथिला के एक बहुत बड़े लोक ज्ञान परम्परा के ज्ञानी डॉक का जन्म हुआ था जो डॉक वचन के नाम से प्रचलित हैं। ऐसे ही मिलता जुलता प्रचलन आप आसाम से लेकर राजस्थान तक है। आप भारत के नक़्शे को देखिए तो आसाम में डाकेर, बंगाल में डाके, मिथिला में डॉक, उड़ीसा में खनन वचन, उत्तर प्रदेश में भांड फिर राजस्थान जाते जाते वो भंडारी हो जाते है।
इसी कड़ी में मैथली भाषा में डॉक वचन की कुछ पंक्ति
छोट छोट घर बानी चौहारा, न में फार जोताई हारा।
थोर थोर बैंच के किनत माच, ताहि घर लक्ष्मी खाल खाल नाच।।

कपडा पहिनी तीन दिन, बुध, बृहस्पति शुक्र दिन।
सैन मारे रोव जरावे, सोम को सुड्डा
मंगल मारे जीव सब, बुध पहिर घर जाए।।
हम बात क्र रहे है महिला सशक्ति कारन पर तो जिस तरह डॉक का जन्म हुआ था आज के युग में यदि उस तरह से होतो क्या परिवार और समाज स्वीकार करेगा उस बच्चे को उस स्त्री। हम बौद्धिकता के किस स्तर पर पहुँच गए हैं।। ……….।

नोट:- भारत मेरे साथ चैनल की सुश्री सुरभि सप्रू जी और पवन कुमार झा की मैथली संस्कृति, महिला सशक्तिकरण ,और डॉक वचन पर विशेष बातचीत को सुनने के लिए नीचे दिए गए चैनल लिंक को क्लिक करें और पूरा सही क्या है एपिसोड को देखें।।

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