विषय:- माँ महाकाली के स्वरूपों का वर्णन
सीरीज़:- लाइव // #नोफिलटर // एपिसोड:- 3
प्रवक्ता:- आचार्य जितेंद्र चतुर्वेदी वाराणसी उत्तर प्रदेश
शीर्षक:- इस विषय पर भैरव तंत्र विमर्श, 10 महाविद्या और देवता भी तंत्र के साथ।तंत्र एक विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान एक प्राचीन पद्धति है, और विज्ञान ज्ञान कोआध्यातिमकता से जोड़ना। आज जो है आचार्य जी से हम लोग देवी तारा पे चर्चा करेंगे।।
देवी तारा के स्वरूप का वर्णन क्या है ?
जी आपने कहा कि पहले हम लोग गंगा का दर्शन करते हैं। जी और गंगा से तारा तक पहुंचने का एक मार्ग है। हम लोग भगवती तारा तक काशी से वीरभूमि तक की यात्रा गंगा के ही माध्यम से करें। और ये जो गंगा रूपी प्रवाह ज्ञान है ये प्रवाह ज्ञान जो है उस बंगाल के खाड़ी में ही जाकर गिरती है। समाहित होती है सागर में। और भगवती तारा जो है वो माँ सरस्वती स्वरूप है। महासरस्वती है और इनका नील वर्ण है। इनको नील सरस्वती के भी नाम से जाना जाता है। भगवती तारा को नील सरस्वती के भी नाम से जाना जाता है।
और सबसे बड़ी बात है कि देवी तारा है कौन?
तारा मातृत्व भाव की सबसे बड़ी दसों महाविद्याओं में एक अद्वैत शक्ति है जिनके संबंध में कुछ भी कहा जाए वो कम है अल्प है वो अल्प ज्ञान की तरह है और भगवती तारा जो है समस्त सृष्टि को मातृत्व ज्ञान के रूप में प्रदर्शित होती है। समस्त सृष्टि के सामने और सबसे बड़ी चीज कि पुराणों में और तंत्र के इत्यादि ग्रंथों में भी ऐसा आता है कि जो महाराज दशरथ थे अयोध्या के तो महाराज दशरथ के जो गुरु वशिष्ठ थे महाराज दशरथ जी के गुरु वशिष्ठ थे। और वशिष्ठ जी का सिद्धासन जो है तारापीठ में था। उन्होंने सर्वप्रथम वहां पर उस शक्ति का साधना किया और आराधन किया।
भगवती तारा के तारा जो है वाक्य सिद्धि को प्रदान करने वाली भगवती है। कुंडमाल को धारण की हुई है अहलार माला होता है जिसको जवा कुसुम भी कहते हैं जवा कुसुम के माला को ही धारण की हुई है भगवती। ऐसे दिव्य स्वरूप में जो प्रसन्न है लेकिन जिह्वा निकली हुई है जिसकी ऐसी भगवती। जिह्वा निकलने का मतलब कि ज्ञान की अधिष्ठात्री है और समस्त ज्ञान को जिह्वा से ही वाणी की उत्पत्ति होती है बिल्कुल वाणी जो है वो तभी निकलती है जबकि जिह्वा हो। जिह्वा ना हो तो फिर वो मुख हैं तो भगवती जो है उस स्वरूप को धारण करके वहां पर विराजमान है और महर्षि वशिष्ठ ने उनकी बहुत साधना की अनवरत साधना की जिससे कि उनको अनेक प्रकार के साधनात्मक रहस्यों का अपने अंदर उन्होंने उसको धारण किया।
और भी बहुत काफी चीजें जो है तारा के संबंध में ज्ञातव्य होती है जैसे तंत्र में भगवती दूसरे रूप में है और मैं इसको एक कथा के संकलन से जोड़ रहा हूं जो कि तंत्र तारा आदि में इसका वर्णन मिलता है एक तंत्र तार नाम का ग्रंथ है और जो है पुराणों में भी इसका कुछ ऐसे ग्रंथ है जिनमें कि इनका लेखन मिलता है कि नहीं क्या है?
तो जिस समय भगवती सती महाराज दक्ष की पुत्री थी और भगवान शिव से विवाह हुआ तो दक्ष ने भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया और जब उन्होंने निमंत्रण नहीं दिया तो भगवती की इच्छा हुई कि हमारे पिता इतने बड़े यज्ञ कर रहे हैं पूरे विश्व के कल्याण हेतु या पूरे ब्रह्मांड के कल्याण हेतु जो भी ये कार्य कर रहे हैं उसमें इन्होंने निमंत्रण तो नहीं दिया लेकिन पुत्री का धर्म यही बनता है कि वह जाए। तो वो जाने की चेष्टा करती हैं और भगवान शिव से कहती है कि आप हमें आदेश दे कि मैं यज्ञ में जाऊं।
तो जो एक ये भी है कि पति और पत्नी दोनों में जो एक मंतव्य जो होता है ना उसमें उतार-चढ़ाव की स्थिति मायके और ससुराल को लेकर होती है। तो ये स्थिति वहां पर उत्पन्न होती है।
भगवान शिव कहते हैं कि नहीं जहां निमंत्रण नहीं है वहां पर तुम मत जाओ। इसलिए कि वहां पर सम्मान नहीं मिलता है। देखिए कोई अपना कितना भी प्रिय हो। और किसी विशेष कार्य को वह संपादित कर रहा हो तो वहां अगर आपको सादर सस्नेह निमंत्रण ना दे सादर सस्नेह पूछे ना तो वहां मत जाइए।
इस प्रकार से तुलसीदास जी ने कहा कि………
आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
भले ही है ना कोई अपना प्रिय से प्रिय क्यों ना हो लेकिन वो ससम्मान पूछता नहीं है सम्मान नहीं देता है तो उसके पास नहीं जाना चाहिए। भले ही वहां पर स्वर्ण की वर्षा क्यों ना हो रही हैं?
हम तो भगवती को मना करती है लेकिन भगवती मानती नहीं है। उसमें भगवती क्रुद्ध हो जाती है। और जब क्रोधित होती है तो महाकाली का रूप धरती हैं। और जब महाकाली का रूप धरती है तो भगवान शिव वहां से निकल के सोचते हैं कि चलो अब ये क्रोधित हो गई। तो अब मैं निकलता हूं यहां से। इनका क्रोध तब तक ये शांत हो जाएंगी। हैं। तो जो ही वह दूसरे तरफ जाते हैं तो वहां पर दसों महाविद्याओं के रूप को देखते हैं कि चारों तरफ से हमको दसों महाविद्या घेरी हुई है।और उन दसों महाविद्याओं के स्वरूप को देखकर शिव भय से व्याप्त हो जाते हैं। और भय से व्याप्त होने के बाद किसी प्रकार से उनके मुख से वो चीज निकलता है। मतलब जाओ तुम्हारी जो इच्छा हो करो तो भगवती फिर जो है वहां से उसी को आदेश के रूप में समझ के और वहां गई है और जब दक्ष के यहां गई है तो दक्ष के यज्ञ में जो क्रम घटित होता है। वह सबको विदित है। सर्वविदित है कि अग्न ध्यान करती है और अग्नि में अपने आप को समाहित कर देती है। इसके बाद में शिव जी वहां से लेकर चले उनके शरीर को तो उस शरीर के जो अंग गिरे हैं उनमें जो भगवत नेत्र है मध्य नेत्र वहां पर गिरा है। हां देखो भव के मध्य में ये जो भव है ना ये दोनों भव के मध्य में जो नेत्र विद्यमान है जिसको कि अग्नि नेत्र के नाम से जाना जाता है। तो वही नेत्र जो है वहां पर गिरा है भगवती तारा श्मशान भूमि में है। उस भूमि को वीरभूमि कहा जाता है। और जी इस तरह जो है भगवती के तारा स्वरूप का वहां पर वर्णन आया है। इत्यादि
मैं ये समझना चाहूंगी आपसे मृत्यु और मोक्ष क्या है ?
जी ऐसा है कि तुम एक सेतु हो। जन्म और मृत्यु के मध्य के तुम एक सेतु हो। क्योंकि तुम इसको समझो और यह तुम्हारा लक्ष्य है कि तुम इन दोनों को सेतु के माध्यम से जान लो कि यह छोर और वो छोर क्या है। ठीक है? और मृत्यु तो सहज है। मृत्यु घटना ही है। कोई उपाय नहीं है उसका।तो मोक्ष का मृत्यु से कोई संबंध नहीं है।
मोक्ष क्या है?
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥
हम आदमी पुनर्जन्म लेता है। ठीक है। हम मनुष्य कहा पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म क्या है? उस मन का आंदोलन है जो मन आंदोलित होता है और वो मन उससे तृप्त नहीं होता है तो उसी चीज के लिए पुनः जो है उस जन्म को लेना पड़ता है वो मृग तृष्णा ही पुनर्जन्म की कथा है। वो जो मृग तृष्णा है अपने अंदर इसको मैं एक श्रीमद् भागवत में कथा आती है। हम लोग विषय वहीं पर हैं। मोक्ष भी भगवती तारा का नाम है। मोक्ष वही देती है। जब तक ज्ञान ना हो तब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। और भगवती तारा जो है वो ज्ञान स्वरूप है इसलिए मोक्ष वही देती है लेकिन अगर ज्ञान हो तब मोक्ष मिलता है हम मन के आंदोलन का ठहर जाना ही मोक्ष है हम और जन्म और मृत्यु के मध्य का जो सेतु है वो केवल वर्तमान है। इसके बाद नहीं है। जैसे हम अगर 10 मिनट बाद सोचे कि यह सेतु है तो नहीं 10 मिनट बाद वाला सेतु नहीं है अभी का सेतु है इसलिए कि 10 मिनट के बाद में हो सकता है मौत खड़ी हो हम और दूसरे जन्म के लिए गर्भवी निर्मित हुआ हो जिसमें कि हमको तुरंत यहां से वहां वापस हो जाना है लेकिन जो मोक्ष है वो मोक्ष वही कहते हैं कि इन बंधनों से मुक्त हो जाना लेकिन ये मन में जब माने तब तो हम मन तो मानता नहीं है। ये तो ₹1 है तो ₹100 के चक्कर में जब तक तृप्त ना हो जाए। तृप्ति ही मुक्ति है। हम तो मोक्ष का यही अंतर है। और मृत्यु जो है मृत्यु ग्रास है, कालचक्र है, जन्म कालचक्र है और इसके मध्य का जो भाव है उसी में आप मोक्ष को पा लो। या फिर जो है फिर सूरत के समान पुनः घूम कर साम्राज्यम प्राप्त भवान वाली स्थिति हो जाए या समाधि की तरह तव ज्ञानम भविष्यति दो ही मार्ग है। या तो ज्ञान है और नहीं तो फिर जो है संसार है। या तो आप प्रभुत्व को एकत्रित करेंगे या तो फिर जो है ज्ञान को एकत्रित करें। तो ये ये चीजें हैं। अब विषय वही है। अब मैं थोड़ा सा इस मृत्यु से तारा को जोड़ रहा हूं। आप थोड़ा समझिएगा। वो श्मशान में निवास करती हैं। वहां मृत्यु घटित होती है हम और उस नदी के तट पर है वहां प्रवाहमान द्वारका होती है तो ऐसे गतिविधियों के मध्य में जो मृत्यु का साक्षी हो तो कैसे साक्षी है वो ज्ञान ही तो उसका साक्षी है और सरस्वती ज्ञान की अधिष्ठात्री हम हैं और गणपति तो इनके प्राण है जी शिव को उसी रूप में धारण की है उसी रूप में स्तनपान कराई है पुत्र रूप में तो पुत्र कौन है उस उस पार्वती का पुत्र कौन है निरालंबोधम शरणम तो उस उस भगवती के जो संतान है तो शिव भी तो गणपति के रूप में उसके संतान है हम और वही शिव पति के रूप में है जो पालन करता है और वही शिव पुत्र के रूप में है जिसको कि जगत रक्षा हेतु भगवती संरक्षण प्रदान करती है तो ये चीज है ये तारा का महाविज्ञान है तारा तारा मतलब क्या होता है? तारा मतलब ज्योति, तारा मतलब प्रकाश, तारा मतलब नक्षत्र, तारा मतलब ज्ञान, तारा मतलब अद्वैत जहां द्वैत की शक्ति ना हो। जहां कोई भेद प्रकट ना हो। इसको कहा गया कि…….
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीं।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥
तो ये जो चीजें हैं ये वही भगवती के लिए ही कहा गया है कि वो स्वर्ग अपवर्ग सब कुछ दे सकती है वो मोक्ष भी दे सकती है उसके हाथ में है। एक श्लोक है आप समझिएगा इसको सुरभि जी कि यत्रास्त भोगो नहीं तत्र मोक्ष अत्रास्त नहीं तत्र भोग श्री सुंदरी सेवन तत्पराणा भोग्यस मोक्षस करे नित्यम जो भगवती श्री सुंदरी का सेवन करता है दसों महाविद्याओं के अंदर जो भी देवियां है जो भगवती का जो श्री का सेवन करता है उसके हाथ में ही भोग और मोक्ष क्ष दोनों ही निर्मित होते हैं। उसको आवश्यकता नहीं पड़ती है कि नहीं हमको मोक्ष चाहिए और भोग चाहिए। वह तो दूसरे को प्रदान कर सकता है। तो जिसके जो भगवती की शरणागति में है जिसको भगवती की शरणागति मिली वो तो इसी तरह और देखिए जहां मध्य नेत्र की बात है वहां भगवती तारा का प्राकट्य मध्य नेत्र से हुआ है भगवती के शक्ति के तो ज्ञान का परम खिंड है आज्ञा चक्र सहस्त्रार से बहुत नजदीक है समझने वाली चीज है ये मोक्ष की देवी है आपने आपने जो प्रश्न किया कि नहीं मोक्ष है तो ये मोक्ष की देवी है।
इस पूरे अध्याय को माँ तारा के स्वरूप को माँ काली को वैराग्य से जोड़ने के विषय में पूरी महत्वपूर्ण जानकारीयों को समझने के लिए आचार्य जितेंद्र चतुर्वेदी जी, जो बनारस से है भारत में साथ चैनल के द्वारा नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें|
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