इस स्थान पर ही किया था भगवान श्री कृष्ण ने किया था अंतिम संस्कार पुत्र का !
नमस्कार धार्मिक यात्रा भारत मेरे साथ के माध्यम से अष्ट भैरव उज्जैन में डाक्यूमेंट्री पर कार्य करते हुए आज महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन के प्रमुख श्मशान चक्रतीर्थ में चक्रपाणी भैरव, श्री बटुक भैरव मंदिर में हैं इस मंदिर के निचे चक्रतीर्थ श्मशान घाट भी है जहाँ पर भगवान श्री कृष्णा ने कवच कुण्डल धारी माता कुंती के पहले पुत्र को जिसे सूतपुत्र दानवीर कर्ण कहा जाता था उनका अंतिम संस्कार किया था।
और उसके ऊपर ये प्राचीन मंदिर श्री बटुक भैरव का जी का है । महाभारत में भी कौनिका खंड का उल्लेख है। दानवीर कर्ण ने बोला था कि मेरे को ऐसी जगह दाह संस्कार करना कि जहां किसी का दाह संस्कार ना हुआ हो । फिर यहां एक तिल बराबर जमीन थी। श्री कृष्ण ने उनके चक्र पे उसके चक्र पे करण का दाह संस्कार यहां था। इसीलिए चक्र तीर्थ कहलाया है।
चक्र तीर्थ सबसे पहले हमें समझना चाहिए कि इसे चक्र तीर्थ क्यों कहा जाता है?
पूरे भारतवर्ष में सिर्फ एक ही श्मशान है जिसे तीर्थ की संज्ञा दी गई है। क्योंकि तीर्थ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां पर भगवान कृष्ण ने अंगराज कर्ण का अंतिम संस्कार किया है। अंगराज कर्ण क्योंकि अंगराज कर्ण से जब भगवान ने अंतिम समय में यह इच्छा पूछी कि आपकी आखिरी इच्छा क्या है? तो उन्होंने कहा कि मुझे ऐसी जगह पर मेरा संस्कार किया जाए अंतिम संस्कार जहां पर तिल भर भी पाप नहीं हो तो भगवान के सुदर्शन चक्र ने अपने सुदर्शन चक्र से चक्र तीर्थ को खोजा और यहां पर अंगराज कर्ण का अंतिम संस्कार किया गया और उसी चक्र तीर्थ श्मशान में स्थित है बटुक भैरव मंदिर भगवान बटुक भैरव तंत्र तंत्र के अधिष्ठाता देवता हैं। किसी भी प्रकार के तंत्र में भगवान बटुक भैरव को पूर्ण तरह से आमंत्रित करना बहुत ही आवश्यक होता है। कोई भी तंत्र हो, किसी भी वर्ग का तंत्र हो, किसी भी प्रकार का तंत्र हो, किसी भी क्षेत्र का तंत्र हो, यदि भगवान बटुक भैरव का आह्वान नहीं किया है, तो वह तंत्र किसी ना किसी प्रकार से अधूरा ही रहता है। अष्ट भैरव में प्रमुख भगवान बटुक भैरव ही हैं। अब भारत में सिर्फ दो ही मंदिर हैं बटुक भैरव के। एक काशी विश्वनाथ में दूसरा उज्जैन में। जब भगवान बटुक भैरव ने ब्राह्मण का मुंड काटा। भगवान बटुक भैरव का जन्म भगवान शंकर से हुआ है। यदि आपने इस बारे में पढ़ा हो या सुना हो। भगवान जब ब्रह्मा जी को यह अहम हो गया कि इस सृष्टि का संचालन मैं ही करता हूं तो भगवान शंकर के अंदर से भगवान बटुक भैरव बालक रूप में उत्पत्ति हुई। उस बालक ने अपनी चीठी उंगली के नाखून से भगवान ब्रह्मा का मस्तक काटा। जो भगवान बटुक भैरव के हाथ में है वो भगवान ब्रह्मा जी का मस्तक है। ब्रह्मा जब भगवान को बटुक भैरव को ब्रह्म हत्या लगी तो मोक्ष के लिए शिपरा नदी के किनारे आए। उसके बाद काशी विश्वनाथ गए। इसलिए दो जगह भगवान बटुक भैरव के स्थान स्थापित हैं।
कई लोगों का यह भी मानना है कि कृष्ण ने कर्ण के साथ में छल किया था। तो मैं उस पर भी एक वर्णन चाहूंगा आपका कि क्या वो छल था ?
बिल्कुल आपका प्रश्न बिल्कुल सत्य है। देखिए कभी-कभी धर्मों को स्थापित करने के लिए छल भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि धर्म आज वर्तमान में वही चल रहा है। यदि कोई आपके धर्म को किसी भी प्रकार से सही व्यक्ति भी हानि पहुंचाएगा तो आपको उसको वहां पर रोकना पड़ेगा। हम जो वर्तमान में देश का परिदृश्य चल रहा है। यदि इस समय कोई संत किसी बड़े उस पर पथ पर बैठा हुआ है और आपको लगेगा कि ये निर्णय धर्म के लिए गलत है तो क्या आप उसे रोकेंगे या नहीं रोकेंगे? बिल्कुल रोकेंगे। हम चाहे आप अपनी बोट की शक्ति से उसे रोकेंगे लेकिन रोकेंगे। उसी प्रकार से उस समय भगवान कृष्ण ने जो किया बिल्कुल सही किया क्योंकि वह भगवान थे तो गलत करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। अबकि रही छल की बात तो आम आदमी या कोई भी व्यक्ति जिसने पूरा अध्ययन नहीं किया है वो उसको छल की नजरों से देखता है। जिसने अध्ययन किया है या जो अध्ययन करेगा उसको बाद में भगवान कृष्ण ही सही लगेंगे।











आप इसको कैसे देखते हैं क्योंकि सनातन धर्म सिर्फ प्रचार करने तक ही है या इसे और गहराई से समझने की आवश्यकता है?
वर्तमान में जो सनातन धर्म का प्रचार चल रहा है। है ना? कुछ लोग अच्छा प्रचार कर रहे हैं। कुछ लोग उसका दुर्भावना से प्रचार करते हैं। जी एक प्रचार होता है वास्तव में सनातन धर्म को बढ़ाने का। एक प्रचार होता है जो विपरीत वर्ग है उसको दबाने के लिए या उसको किसी ना किसी प्रकार से मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए। कुछ संत गादी पर बैठ बैठकर या व्यास गादी पर बैठकर इस प्रकार की भाषण बाजी या बयानबाजी जरूर करते हैं जो संबंधित वर्ग विशेष पर किसी प्रकार से उनको चोट पहुंचाती है। हम अब क्या होता है कि हमारे यहां शुरू से संतों को सुनने की और उनके आचरण पर चलने की परंपरा है। जी तो कहीं ना कहीं अध्ययन गोंड हो जाता है। कि इन बाबा जी ने ऐसा बोला हम इन बाबा जी ने जैसे कोई बाबा जी ने अगर किसी बीमारी का इलाज बता दिया कि यह वाला पानी पी लो या ये नीम की छाल खा लो या जो भी कर लो एक्स व जेड हम तो भारतीय आदमी बड़ा भावुक और अच्छे और सच्चे मन का होता है। तो वो उसी दिशा में चल पड़ता है। कायदे से वो मेडिकली और प्रैक्टिकली बिल्कुल सही नहीं होता है। क्योंकि हमारा अध्ययन कमजोर है। जैसे-जैसे हम अध्ययन करते जाएंगे इसलिए सबको पढ़ना चाहिए। क्योंकि पढ़ने का ज्ञान कोई भी संत नहीं देता है। आप उनको स्वयं को बोलो कि आप अध्ययन करो। जब आप अध्ययन करेंगे तो सही और गलत का चयन आप खुद ही कर पाएंगे।
तंत्र परंपरा सनातन में कितनी क्या महत्व है?
तंत्र का पूरी तरह से भारतीय परंपरा में महत्व है। जी जो कार्य वैदिक मंत्रों से पूर्ण नहीं होते हैं या फिर जो सफलताएं वैदिक मंत्रों से आदि अनादि काल में पूर्ण नहीं हुई उसके लिए तंत्रों का जिसको आप कह सकते हैं तंत्रों का उद्गम इसीलिए हुआ। हम जब तंत्रों का उद्गम हुआ तो यदि कोई आप कार्य कर रहे हैं और वह वैदिक कार्य से पूर्ण नहीं हो रहा है तो वहां पर तंत्र का इस्तेमाल किया जाता है और यह बात सत्य है पहाड़ी राज्य जिसे चाहे हिमाचल हो चाहे कश्मीर हो हिमाचल को देवभूमि भी कहा जाता है। कश्मीर को भी तंत्र वहां से आया क्योंकि अब भारतीय पहले भारत सिर्फ कश्मीर तक ही सीमित नहीं था। है ना? यह अखंड भारत है। जी अखंड भारत है। दूर-दूर तक बाद में देश जो भी परिस्थितियां बनी विषम भौगोलिक परिस्थितियां अलग होती गई है ना? तो अलग-अलग मार्गों के तंत्र अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं। जिसने जैसा ज्ञान के आधार पे जिस संत ने तंत्र की उत्पत्ति करी वैसा तंत्र उस आधार पर चल रहा है।
सेव तंत्र हो, कोलाचार तंत्र हो, वामाचार तंत्र हो
या किसी भी प्रकार का तंत्र हो। जिस किसी ने भी जैसे तंत्र की उत्पत्ति करी अब तंत्र भी एक प्रयोग है क्योंकि उन्होंने भी किसी समय कुछ प्रयोग करके देखा होगा किसी मंत्रों को जैसे कि शायद आप जानते हो या नहीं जानते हो संपुटित करके मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। अब कौन सा मंत्र किस प्रकार के प्रयोग में कार्य आएगा यह संतों के द्वारा ही उत्पत्ति है जो वर्तमान में आज तक चली आ रही है। कुछ तंत्र गोंड हो गए। कुछ तंत्र आज भी आपको और हमको जो जानकारी में आते रहते हैं जो पुरानी किताबों में भी दिए गए हैं। अब नई दुनिया है, नई व्यवस्था है, नई व्यवस्था के हिसाब से भी तंत्र आगे बढ़ता रहता है और परिवर्तित होता रहता है। इसलिए सिर्फ कश्मीर को कहना ठीक नहीं होगा। जी। अलग-अलग क्षेत्रों से अलग-अलग प्रकार के तंत्र भारतीय सनातन को प्राप्त हुए हैं।
कलयुग में सनातन की जो विशेषता है आप कितना अधिक देखते हैं?
अब कलयुग अच्छा आप मुझे बताइए जो आपका प्रश्न है ये कलयुग बहुत वास्तव में बहुत अच्छा युग है। हम कलयुग कोई बुरा युग नहीं है। आज के समय में आज आप जहां पर बैठे हैं तो ये कलयुग में ही बैठे हैं। कलयुग की करोड़ों वर्ष आयु है। कुछ एक वर्ष पूर्ण हो चुकी है। अब जो हमने पढ़ा है और जो हमको ज्ञान दिया गया है। कलयुग मतलब बहुत बुरा युग। जी वही मैं कह बहुत बुरा युग। लेकिन क्या ये प्रैक्टिकली सही है? यह प्रैक्टिकली बिल्कुल सही नहीं है। आज यहां पर आप बैठे हैं। आपके लिए चेयर है, चाय की व्यवस्था है, आपके हाथ में कैमरा है, फोन है। क्या किसी भी प्रकार से आप सुविधाएं ले है ना हर प्रकार से? हर प्रकार की सुविधाएं आपको हैं। हम क्या आप अपने आप को सतयुग में आप दूर मत जाइए। मैं आपकी और हमारी बात करता हूं। आप क्या किसी भी प्रकार से सतयुग में रहने योग्य हैं? वर्तमान के हिसाब से यदि कोई आपको नंगा संत दिखेगा या कुछ भी दिखेगा तो आपके मन में क्या आएगा कि इसको कंबल दिए जाए कपड़े दिए जाए कि और उसको भी जरूरत कलयुग वाली व्यवस्था की है जो सतयुग में जी रहा है। कलयुग किसी प्रकार से बुरा नहीं है। इसको हम लोगों ने थोड़े से आचरण और विचारों से बुरा बना दिया है। आचरण और विचारों से बुरा बना दिया है। एक तो एक दूसरे के प्रति घृणा काफी ज्यादा बढ़ गई है। घृणा भी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि व्यवस्थाएं बढ़ी हैं। लालसा बढ़ी है, लालच बड़ा है। बहुत सारी चीजें बढ़ी है। एक ही चीज दो आदमी को चाहिए तो कंपटीशन होता ही है। क्योंकि वो पहले नहीं था। पहले इतनी पहले किस प्रकार की सोच रहा करती थी लेकिन इस प्रकार की लालसाएं नहीं रहा करती थी। आज किसी को एक गाड़ी चाहिए तो वो गाड़ी दूसरे को भी चाहिए। तो कंपटीशन बड़ा है। पोजीशन चाहिए। पहले पोजीशनों का खेल नहीं हुआ करता था। पुराने समय में पोजीशनिंग की इतनी चर्चाएं नहीं थी। तो थोड़ा सा क्या है कि एक दूसरे की घृणा ने कलयुग को बुरा बना दिया है। और थोड़े से हमारे आचार विचारों ने और हमारी मानसिकताओं ने ही इस कलयुग को बुरा बनाया है। कोई भी युग बुरा नहीं होता। हर युग अपने हिसाब से अपनी व्यवस्थाएं ढालता है। आज यदि आप और हम कलयुग की बात नहीं करें। आप हमारे जीवन को हम चार युग में बांट लें। हम आज हमारे जीवन को हम चार युग में बांट लें। 20 साल पहले क्या आपके हाथ में मोबाइल थे? नहीं थे। उस समय वो युग अच्छा था। आज मोबाइल है, टेबलेट्स हैं। इस समय यह युग अच्छा है। बुरा कुछ नहीं है। कोई युग बुरा नहीं होता। लेकिन अब कोई आपसे कहे कि आपने इस टेबलेट और मोबाइल का बुरा उपयोग कर लिया तो किसकी गलती है? यह हमारी व्यक्तिगत गलती है। किसी ने उसका सदुपयोग करा तो उसने उस युग का सही इस्तेमाल करा। जी। तो इन चीजों कोई भी युग बुरा नहीं होता है। हर युग में अपने अपने हिसाब से आविष्कार होते रहते हैं। तरह-तरह के उनका उपयोग और सदुपयोग दुरुपयोग उस समय भी हुआ होगा। जैसे कि अभी आपने कहा कि कृष्ण भगवान जैसे जो लोगों को लगता है कि अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर लिया उन्हें समझ लिया कर्ण कौन है उन्हें समझ तो ये तो उस समय भी दुरुपयोग है द्वापर युग का जी उस समय भी दुरुपयोग है आपने रावण ने दुरुपयोग करा अपनी शक्तियों का चाहे सीता हरण के लिए किया हो या तो उस समय भी दुरुपयोग है। जैसे उस समय दुरुपयोग युगों में हो रहा था वैसे इस समय दुरुपयोग युगों में हो रहा है। तो इसका मतलब यह नहीं कि कलयुग में होने वाले सभी लोग खराब है या फिर केवल सदुपयोग और दुरुपयोग की बात है। जो व्यवस्था युग आपको देता है उसका आप किस प्रकार से सदुपयोग और दुरुपयोग कर रहे हैं?
माता-पिता हैं वो बच्चों को किस तरह से संस्कार दें?
आज के समय में क्या है कि संस्कार बहुत जरूरी है बच्चों को क्योंकि कहीं ना कहीं आप देखने में आता है कि माता-पिता ही संस्कार विहीन है। हम तो बच्चे क्या सीखेंगे? इसलिए बच्चों को सबसे पहले अध्ययन पर जोर देना चाहिए। बच्चे अच्छा पढ़ेंगे तो अच्छा सीखेंगे। बजाय किसी के गलत गाइडेंस के कि वो क्या बोल रहा है वो सीखो। नहीं आप बच्चों को तार्किक बनाइए। तार्किक बनाइए। यदि कोई बात कुछ बोल रहा है तो उसमें उनका प्रश्न हो कि ऐसा कैसे हमने तो ऐसा पढ़ा हुआ है। जी जब वो पढ़ेंगे पढ़ा हुआ गलत नहीं हो सकता। जब वो शास्त्र पढ़ेंगे सब पढ़ेंगे तो हर प्रकार से किसी प्रकार से उनको सही ज्ञान अपने आप हासिल होगा। हो सकता हो कोई बच्चा मां-बाप से भी ज्यादा पढ़ लिख ले और उसको उससे भी ज्यादा ज्ञान हो। जरूरी नहीं है। बच्चे पर माता-पिता अपने संस्कार डाल सकते हैं 15, 16, 17 साल की उम्र तक। फिर बच्चे का अध्ययन और बच्चे का एटमॉस्फेयर बहुत सारी चीजें डिसाइड करता है। इसलिए माता-पिता अपनी तरफ से पूरी कोशिश करें कि बच्चों को अच्छे संस्कार दें और अच्छी पुस्तकें उनके हाथ में दें।। पुस्तकें जितनी अच्छी आप हाथ में देंगे बच्चों का उतना ही अच्छा और संस्कारवान विकास होगा।
ये एक बहुत ही सार्थक चर्चा हमने करी स्वामी जी के साथ में। हम इस वक्त है बटुक भैरव मंदिर में जो काल भैरव और बटुक भैरव है वही सबसे बड़े भैरव हैं और अन्य भैरवों की तरफ हम जो है अब प्रस्थान करेंगे तो भैया के सहयोग से हम लोगों ने जो है बटुक भैरव के दर्शन कर लिए हैं जो मुख्य भैरवों में से एक हैं और स्वामी जी ने जो है पूरे भैरव की कहानियां हमें जो सुनाई है और तंत्र परंपरा पे भी बहुत अच्छी चर्चा उनके साथ में हुई तो आप सभी इस यात्रा के साथ जुड़िए और हमें सब्सक्राइब कीजिए, फॉलो कीजिए और सनातन धर्म के लिए सहयोग कीजिए। बहुत-बहुत धन्यवाद। देखते रहिए भारत मेरे साथ।




