Monday, January 26, 2026
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ब्रज में भगवान श्री कृष्ण ने किस किस प्रकार से लीलाएँ की हैं और होली का कैसा और किस तरह से भाव रहता है।

नमस्कार भारत मेरे साथ चैनल में आप सभी दर्शकों का स्वागत हैं। आज बात करेंगे ब्रज की होली की, रास की, लोक गीतों की। ब्रज में भगवान श्री कृष्ण ने किस किस प्रकार से लीलाएँ की हैं और होली का कैसा और किस तरह से भाव रहता है। होली के महत्त्व और ब्रज के इतिहास को जानने के लिए ब्रज भूमि में भारत मेरे साथसे सुरभि सप्रू जी वृन्दावन के पंडित रूपेश कुमार जी से बात करेंगी।

प्रश्न:- ब्रज भूमि क्या है ?
उत्तर:- पंडित रूपेश जी कहते हैं कि ब्रज हमारा घर है हम ब्रजवासी हैं। ब्रज अर्थात श्रीधाम वृन्दावन ! लेकिन सिर्फ वृन्दावन ही ब्रज नहीं है अभी तक ८४ कोष मंडल के अंदर जितने भी गांव स्थान आते हैं वो सम्पूर्ण ब्रज है जिसके ब्रज ८४ कोष कहते हैं। और श्री राधा रानी और भगवान श्री कृष्ण जी की ये क्रीड़ा स्थली भी है इस भूमि में श्री कृष्ण जी ने कई लीलाएँ की हैं यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ने कितने सारे लोगो को मुक्ति दी है। ब्रज भूमि इक ऐसी भूमि है जहाँ आज भी देश विदेश श्रद्धालु आते हैं और इसमें से सभी तो वापस चले जाते हैं लेकिन जिनको श्री कृष्ण से प्रेम होता है वो लौट कर नहीं जा पता है इनकी भक्ति में यहीं पर रम जाते हैं और भक्ति करते रहते हैं जन्मों जन्म तक।

प्रश्न :- ब्रज के लोकगीत कैसे और क्या हैं ?
उत्तर:- ब्रज के लोकगीत में है ब्रज की रसिया किन्तु रसिया का मतलब है कि कृष्ण जी जब श्रृंगार करते हैं और गोपियों के संग लीला करते हैं और उनके जो भाव होते थे जो भजन गाते हैं। उसे रसिया कहते हैं। लोकगीत जैसे हमारे श्री कृष्णा ठाकुर जी ने गिरिराज पर्वत को अपनी ऊँगली के नक पर उठाया था जब इंद्र देव ने भारी बारिस उस समय तब वहां की गोपियों ने बड़ा सुन्दर भाव गाया था।

नख पर गिरिवर लीनो धार, कन्हैया मेरो बारो,
कन्हैया मेरो बारो,कन्हैया मेरो बारो ।
यूँ कहे यशोदा मैया, नेक ज़ोर लगाओ मेरे भैया,
अरी यह कैसे झेले भार, कन्हैया मेरो बारो,
कन्हैया मेरो बारो, कन्हैया मेरो बारो ।

इस कड़ी में जब हम विरह गीत की बात करते हैं यह विरह गीत तब गाया जाता है जब मथुरा के राजा कंस ने कृष्ण जी को नंदगाव से मथुरा बुलाने के अक्रूर जी भेजा था क्योंकि इनसे पहले भगवान कृष्ण जी ने कंस के द्वारा भेजे हुए सभी दूतों को मुक्ति प्रदान कर दिया था इस लिए इस बार अक्रूर जी को भेजा था तब गोपियाँ कृष्ण को मथुरा जाने से रोकती हैं रुदन भाव से अक्रूर जी से कहती हैं की कृष्ण जी को ना लेजाओ मुझे लेकर चलो तब भी कृष्ण जी नहीं रुकते हैं तब गोपियाँ विरह करती हैं। और कृष्णा जी को नंदगांव से विदा करते हुए विरह भाव में गीत गाती हैं

“”बिदा गोपाल बिदा,तेरे सुख में, सुख हमारो
तेरे दुःख में, दुःख हमार बीड़ा गोपाल विदा “”

प्रश्न :- ब्रज में होली का क्या महत्त्व और कैसे होती हैं ?
उत्तर: – होली का जो त्यौहार है वो ब्रज भूमि का है। वो केवल मथुरा बरसाना और वृन्दावन की ही नहीं है ये सम्पूर्ण ब्रज यानि की ८४ कोष के अंदर होती है। लेकिन बृंदावन मथुरा बरसाने नंदगांव में जो होली का महत्त्व होता है वो इस लिए की यहाँ पर बसंत पंचमी से ही रंग का उत्सव माने जाने लगता है ये पुरे ४१ दिन तक होली होती है जिसमे बसंत पंचमी से सूखा रंग फिर एकादशी से गीले रंग लगाने की परम्परा है ब्रज में बताते हैं की होली भी दो होती हैं इक होली दूसरा हुरंगा होता है हुरंगा सिर्फ बरसाने मथुरा वृन्दावन गोकुल नंदगांव में ही होता हैं इसमें रंग से नहीं लठ मार कर मनाया जाता है।। ब्रज वासियों में होली की इक और भी परम्परा है जो होली से नंदगांव के गवाला बरसाने में जा कर होली खेलने का निमंत्रण देने जाते हैं उसके बाद वहां पर होली खेलने जाते हैं लेकिन यहाँ ग्वालों को रंग के साथ लठ मार होली खेलनी होती है जी हाँ बरसाने मथुरा वृन्दावन में लठमार होली होती है इसके साथ ही रंग भई खेला जाता हैं।

ये होली खेलने की परम्परा आज कि नहीं द्वापर के समय से चली आरही है बताते हैं कि भगवान श्री कृष्णा राधा रानी जी से होली खलेने बरसाने जाते हैं लेकिन राधा रानी की सखियों को ये जब बात पता लगती हैं की नंदगांव से ग्वालवाल आरहे हैं कृष्ण के संग में तो वो सब राधा रानी को छुपा देती है तो राधा रानी कृष्णा जी को देखने की कोशिश करती हैं तो सभी सखियाँ होली पर गीत गाती है।

कन्हैया रंग तोपे डालेगो सखी घूंघट काहे खोले
भर पिचकारी तोरे माथे पर मारे। माथे पर मारे।माथे पर मारे।
सखी तोहरे बिंदिया की सुरंग बिगारे।सुरंग बिगारे।सुरंग बिगारे।
कन्हैया रंग तोपे डालेगो सखी घूंघट काहे खोले।
ठंडो पानी ते तोहे भिगावेगो सखी घूंघट काहे खोले।

पंडित रूपेश जी से ब्रज की होली और लोकगीत को सुनने और जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करे और चैनल को लिखे शेयर सब्सक्राइ

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