रंगकर्मी सुमन कुमार के जीवन का सफर बिहार से संगीत नाट्य अकादमी तक !
सुमन कुमार अपने जीवन का सफर के बारे में बताते हैं कि यात्रा तो पूरी दुनिया में सभी लोग यात्री ही हैं बस जगह बदलते रहते हैं मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपनी जगह और उसके साथ में कभी कभी इरादे और अपने उद्देश्य भी बदल लेता है। रंगकर्मी सुमन कुमार का जन्म 8 दिसम्बर 1967 में बांका, बिहार में हुआ है। और बताते हैं कि तब के बिहार और अब के बिहार बहुत ही अलग है और उस वक्त अपनी स्मृति में कहे तो बहुत धुंधली धुंधली सी यादें हैं उसमे कुछ नक्सल घटनाओं के धमक की तो कुछ रामलीला की जिसके लिए घर में पिटाई भी कभी कभी हो जाती थी। इसी के साथ में पैतृक गांव समस्तीपुर में प्रारंभिक की शिक्षा दीक्षा शुरू हुयी इसके बाद माध्यमिक विद्यालय किशनगंज से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। उसी के साथ में आरएसएस के शाखाएं में भी जाते थे। इसके बाद पटना से उत्तर माध्यमिक विद्यालय से इंटर तक की शिक्षा प्राप्त की और पटना से ही रंगशाला की भी शुरुवात हुयी वैसे ये अपने गांव में नाटकों में भाग लेते थे। इसके बाद से 1996 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली से और 1998 में माउंटव्यू थिएटर स्कूल, लन्दन से डिजाईन में प्रशिक्षित सुमन ने पटना विश्वविद्यालय से बी. एड.(91-92) और मगध विश्वविद्यालय से भौतिकी में होनर्स(1988) की पढाई की है. 1984 से इप्टा, पटना से जुड़ कर रंगकर्म में सक्रीय हुए.
सुमन ने नाटक लिखे, निर्देशित और अभिकल्पित किया तथा विविध विषयों पर संगीतिकों, नाटकीय अभिव्यक्तियों की रचना की. कविताओं और अनाटकीय कथ्य और साहित्य को मंच पर प्रस्तुति करने के लिए विशेष रूप से चर्चित रहे. रुपांतरण, अनुवाद और नाट्य लेखन से 30 से भी अधिक मंचित प्रस्तुतियों के हजारों मंचन विविध भाषाओँ और शैलियों में हुआ. रंगमंच के भारतीय एवं विदेशी विविध विचार, अभ्यास, सन्दर्भ, जीवन और दर्शन तथा प्रयोग सूत्रों और प्रशिक्षण पद्धतियों पर सुमन ने कई आलेख भी लिखें हैं. रंगमंच के मौलिक आस्वादन का नया अनुभव सृजन के लिए सतत प्रयोगशील सुमन कुमार ने एक अभिनेता, निर्देशक, परिकल्पक, प्रशिक्षक और नाटककार के रूप में योगदान देते हुए, 2012 से संगीत नाटक अकादेमी, दिल्ली के एक अधिकारी के रूप में रंगमंच, लोक कला एवं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सेवा में कार्यरत हैं. सुमन ने डेनमार्क, लन्दन, पेरू और क्यूबा में रंगमंच और प्रदर्शन के सन्दर्भ में अभिनेता, नाटककार और व्यस्थापक के रूप में यात्रा की.



रंगमंच में योगदान के लिए सुमन को पटना में आंसु संवाद लेखन पुरस्कार तथा कलाश्री सम्मान, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं संगीत नाटक अकादेमी, दिल्ली की छात्रवृत्ति एवं अध्धयनवृत्ति, चार्ल्स वैल्स इंडिया ट्रस्ट स्कालरशिप, भारत सरकार की कनिष्ट संस्कृति फ़ेलोशिप के साथ 2012 में नाट्य लेखन के लिए महिंद्रा एक्सेलेंसी अवार्ड दिया गया. सुमन को नाट्य लेखन के लिए रास कला सम्मान, नटसम्राट सम्मान भी मिला है। 2017 में आल इंडिया फोक आर्टिस्ट फेडरेशन द्वारा “लोक कलाविद सम्मान”, हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार के द्वारा 2017-2018 का “नाटक सम्मान”. से सम्मनित किये गए।
नाट्य शास्त्र का गठन कैसे ?
रंगकर्मी सुमन कुमार जी बताते है की कश्मीर की स्थिति देखिये।इस जम्बूद्वीप मानें तो उस हिस्से में देखा तो वो जम्बूद्वीप बड़ा फैला हुआ है।क्योंकि ये?अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।आज भी हमारे सभी संस्कार कर्मों में रीती रिवाजों में जब भी कोई पूजा पाठ होता है तो हमारे यहाँ पंडित जम्बूद्वीप भारत खंड नाम लेते हैं तो इसमें ये था कि व्यक्ति इस पूरे भूभाग से अपने आप को जोड़ सकें और नाट्यशास्त्र जो कि अभ्यास की वस्तु थी और ऐसा नहीं है कि नाट्य शास्त्र में वह चीजें लिखी गई जो पहली थी वो दरअसल समझी गयी। पहली बार एक ऐसे संगत बैठी होंगी जिसको हम नाट्य सांसद कहते हैं।या कला संसद भी कह सकते हैं।एक पहली बार जम्बू द्वीप का पूरा कला संसद बैठा था, जो अपनी अपनी तमाम संस्कृतियों को अभिव्यक्तियां के लेकर जो विविध संस्कृति अभिव्यक्तियां उनके प्रदेश में, भाषा में, घर में, उनके द्वार में, दीवारों में, पहाड़ों में, प्रकृति में बनावट में, पशु पक्षी में जो कुछ भी कलात्मक सुंदरआत्मक दिख रहा था। उन सब को लेकर वे वहाँ पर उस संसद में आये।वे सब बैठकर उन्होंने कहा की इसे भी शामिल करो।तो सबकी बातें सुनी गई और फिर कला का संविधान बना। कला का संगठन हुआ। ये कला संविधान ना बदलने वाला संविधान है, इसे कभी बदल नहीं सकते। दरअसल नाट्यशास्त्र ही वो असली मानव का संविधान है। नाट्यशास्त्र सभी जगहों पर मौजूद था नाट्यशास्त्र के प्रयोग मौजूद थे। ये जरूर है कि उसको एक जगह पर संगठित नहीं किया गया था।सभी जगह का अपना अपना एक नाट्यशास्त्र था ।तो इसमें कश्मीर भी केरल भी इत्यादि कला क्षेत्र थे तो उसकी एक एक प्रतिलिपियाँ सभी लोगों के पास कहीं न कहीं थी ।क्योंकि उसके एक प्रतिलिपि केरला में मिली तो वहाँ से नाट्यशास्त्र प्रतिलिपि को लेकर उसमें 13 -14 भाष के नाटक मिले क्योंकि वो तामपत्र भोज पत्र में लिखे जा रहे थे, पहले तो अभी भी उसी आधार पर मिले।
कश्मीर के नाट्य शास्त्र में कश्मीर के अभिनव गुप्त का योगदान
रंगकर्मी सुमन कुमार जी बताते है की नौवीं -10वीं सदी के आसपास जब अभिनवगुप्त आते हैं तब उन्होंने नाट्यशास्त्र की संपूर्ण व्याख्या लिखी।क्योंकि जब पहले भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र को लिखा था तो सूत्रों में लिख दिया था।वे सर्वसम्मत से एक कला संगत बैठी होगी कला सांसद जो है यह भरतमुनि का नाट्यशास्त्र लिखा, लेकिन वह अभी तक दबा रहा था।अभिनवगुप्त से पहले तक।दरअसल कहे तो नाट्यशास्त्र को सहज सुलभ बनाने का जो महत्वपूर्ण काम रहा या महत्वपूर्ण योगदान रहा है।वो कश्मीर ने किया था और अभिनवगुप्त के काम से आया था।और वहा पर देखिये तो कश्मीर में भांडों के पूरे के पूरे गांव थे जो भांड नाटक किया करते थे।पहले कलाकार को भांड ही कहते थे तो वो एक जम्बू द्वीप के वासी रहे।कश्मीर का इस तरह से योगदान रहा है क्योंकि उन्होंने पूरा अपना कला में योगदान दिया था और कश्मीर में कई सारे अभी भी फोक कलाएं हैं। वहाँ अभी भी सूफियाना मत चलता है।
रंगमंच और नाट्यशास्त्र पर रंगकर्मी सुमन कुमार की इस रोचक बातचीत को देखने और सुनने के लिए दिए गए भारत मेरे साथ चैनल लिंक पर क्लीक करे और चैनल को सब्सक्राइब करें। शो पर बोली गयी कोई भी बात चैनल के द्वारा लिखित नहीं है जो भी अतिथि या प्रवक्ता बात कर रहे हैं वो उनके खुद की विचारधारा हैं भारत मेरे साथ चैंनल उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।




