Monday, January 26, 2026
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HomeNewsजानें आचार्य मुकेश नौटियाल से पितृ श्राद्ध र्और पितरों का महत्त्व

जानें आचार्य मुकेश नौटियाल से पितृ श्राद्ध र्और पितरों का महत्त्व

प्रश्न:- पितरों का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है ?
उत्तर:- पितरों का हमारे जीवन में सबसे बड़ा महत्त्व होता है और पितरों का भी एक पितृ गायत्री मन्त्र है। उसमे लिखा हुआ है।
ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:।

अब क्या होता है जब श्राद्ध पक्ष चलता है तो हम सभी अपने पितरों को जो है तिलांजलि या जलांजलि उनके निमित अन्नदान या जो कुछ भी दान करते हैं और यह मन्त्र कह रहे हैं कि “नित्य मेप नमोः नमः ” अगर आप पित्रों के निमित कुछ भी कर सकते हो तो
आप नित्य मेव नमोः नमः का जाप करे और प्रत्येक दिन नित्य निरंतर जो है पितरों को नमस्कार करें। क्यूंकि पितृ वो होते हैं जब हमारी आयु पूर्ण होती है उसके बाद मृत अवस्था को लेकर जब चले जाते हैं उसके बाद जो है हम एक वर्ष तक प्रेत की योनि होती
है। उसको प्रेतत्व प्राप्त होता हो जाता है और एक वर्ष बाद उसका जो सापिंडी करण श्राद्ध हो जाता है तब जाकर उसको पितरों में मिलाया जाता है इसके बाद उसको पित्रों की संज्ञा दी जाती है उसी को हम पितृ कहते हैं। इसके बाद वो हमारे देवता बन जाते
हैं।।

प्रश्न:- पिंड दान कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर:- आज के समय की पीढ़ी में जो है वो इस बात को जो बिलकुल भी नहीं मान रही है। लेकिन किसी की मृत्यु हो गयी है तो कई लोग 2 से 4 दिन में सब कुछ कर करा कर चले जाते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता है। आप गरुण पुराण को जब पढोगे तो इसके अंदर
बताया गया है की 10 दिन तक के जो पिंड दान होते हैं जिसको हम दसगात्री के पिंड कहते हैं। लेकिन पिंड वो नहीं होते है जिसे आंटे से बनाया जाता है पिंड का मतलब होता है शरीर।
तो जब हम पहले दिन के पिंड दान करते हैं जिस दिन मनुष्य की मृत्यु होती है उस दिन तीन प्रकार के पिंड दान करते हैं मलिन सोडसी, माध्यम सोडसी और उत्तम सोडसी और इसके तीन प्रकार के विधान भी होते हैं और पिंडो की जो संख्या होती है वो 64
प्रकार के होते हैं लेकिन आज के समय में लोग इन विधानों को नहीं करते हैं।।
प्रश्न:- पितृ दोष क्या है ?
उत्तर:- पितृ दोष का जो कारण होता है वो है जब राहु और केतु जब हमारी कुंडली में बैठते हैं और एक तरफ सभी गृह हो जाते हैं।
राहु और केतु के बीच में जब सब गृह आ जाते हैं ऐसी परिस्थिति में ज्योतिष्य के अनुसार इसको काल सर्प दोष भी कहा जाता हैं और पितृ दोष भी कहते हैं।।

प्रश्न:- पितरों को तर्पण करने की विधि विधान क्या है?
उत्तर:- देव तर्पण, ऋषि तर्पण और पितृ तर्पण हमारे हांथो में ही इन तीनो का स्थान बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार हमारे हाँथ का जो अग्र भाग होता है इसको देव तीर्थ कहा गया है। देवताओं के निमित जब हम तर्पण करते हैं तो हाँथ को गोकर्ण जैसी मुद्रा बनाई
जाती है और गोकर्ण से आगे को जल गिराया जाता है इसको देव तर्पण कहते हैं। अब ऋषि तर्पण की तो हमारे हाँथ में है जिसे ऋषि तीर्थ कहा जाता है जससे संत महात्माओं के निमित ऋषियों के निमित तो तर्पण दिया जाता है। अब बात करेंगे पितृ तर्पण की
जब हम अपने पितरों को अपने पुरखों को तर्पण देते हैं।
कैसे और किस तरह किया जाता है तर्पण की क्रिया देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें और चैनल को लाइक सब्सक्राइब और कमैंट्स करें।

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