हम लोग समझना चाहेंगे। सबसे पहले मां के अवतार को ही समझेंगे। जैसे हर बार हम लोग जो है आपसे उसका एक मतलब अच्छा जो है एक अच्छा अच्छे से हमें जो है मां के स्वरूप को समझाते हैं। तो मैं उसी को ही सबसे पहले जो है समझना चाहूंगी कि मां त्रिपुर सुंदरी का स्वरूप क्या है?
मैं ध्यान से आरंभ करता हूं इस क्रम को। जी भगवती के ध्यान से
सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलि स्फुरत्
तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्न घटस्थ रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥
ये माँ भगवती की स्तुति है और उनका जो स्वरूप का वर्णन किया गया है वो वो अति दिव्य बालार्क सूर्य के समान जिनकी कांत विद्यमान है और जो इनकी आभा है वो सिंदूरी कलर का है। सिंदूरी रंग का आभा है। जिसको रक्त आभा भी कहा जा सकता है। वैसे आभा से परिपूर्ण है। जिनके हाथ में अंकुश है। पास है, परद है और इच्छु है। ऐसे भगवती जो मुस्कुरा रही हैं और इस जगत का संचालन कर रही हैं। ऐसे भगवती को हम नमन करते हैं। प्रणाम करते हैं और अपने शरणागति के लिए प्रार्थना करते हैं कि हमें शरणागति दें। त्रिपुर सुंदरी जो है वो तीनों पुर की मालिक है। भगवती त्रिपुर सुंदरी ही त्रिपुर की मालिनी है।
ये त्रिपुर है क्या?
इच्छा शक्ति क्रिया ज्ञान शक्ति क्रिया शक्ति स्वरूपणी ऐसे त्रिपुर का भाव है। स्वर्ण रजत और लोह ये तीनों चीजें जो है जुड़ी हुई है। और त्रिपुरा सुंदरी भगवती का इनके स्वरूप का वर्णन ब्रह्मांड पुराण में भी बहुत अच्छे से आया है। बहुत ती रूप में आया है। और यही त्रिपुरा सुंदरी स्त्री विद्या के रूप में विद्यमान है। इन्ही को सुग्रति कहा जाता है। है ना ये नौ यमुना है सोडसी है जिनके स्वरूप में पूरा ब्रह्मांड प्रकृति समाहित है और इनका अवतार क्यों हुआ सबसे मुख्य बात है कि इनका अवतार क्यों हुआ मैं थोड़ा सा अवतार के प्रसंगों पर प्रकाश डाल रहा हूं भगवती के कि एक भंडासुर नामक दैत्य हुआ और वो भंडासुर नामक दैत्य का वध करने के लिए भगवती का प्राकट्य हुआ और भंडा सुर का निर्माण कैसे हुआ?
तो भंडासुर का निर्माण जो भगवान शिव ने अपने त्रिनेत्र से काम देव का भस्मीकरण किया था। जिसको भस्मभूत किया था। उसी के भस्म से भंडासुर की उत्पत्ति हुई थी।
और उसको उत्पन्न कौन किया? बनाया कौन?
तो गणेश जी ने बनाया। महागणेश महागणेश ने बनाया।
इसलिए भंडासुर भी बड़ा प्रबल था और वह भी बड़े छल छिद्र से ज्ञान को लिया उनसे जो भी ज्ञान थे उनको लिया हो और उससे उपद्रव शुरू किया किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो उस चीज की अधिकारिता को ना समझता हो उसके अधिकार को ना रखता हो जिससे कि वो जगत का कल्याण कर सके वो केवल विपरीत दिशा में उस धर्म का कार्य करता है। उस धर्म का प्रयोग करता है, उपयोग करता है। तो ऐसे व्यक्ति को फिर भगवती इसलिए कि इसमें भी त्रिपुर हो जाता है। मोह, माया और अहंकार ये तीनों जुड़ते हैं तो ये त्रिपुर है। और जिसके पास मोह, माया और अहंकार तीनों हो तो उसका पद बहुत साधारण नहीं होता है। उसको एक ना एक पकड़ा रहता है और उससे त्रिपुर की संभावना बने रहे। इसीलिए भगवती अपने हाथ में अंकुश ली है। मतलब माया रूपी बंधन को काबू में रखती हैं। उसको इधर-उधर नहीं होने देती। पास ली है। उस माया रूपी सारे के सारे मोह माया जो भी बंधना आदि हैं उनको बांधती हैं। उनको संतुलित रखती हैं। यह उनका कार्य है। वरद है हाथ में। वरद मतलब आशीर्वाद। वो भगवती आशीर्वाद भी देती है। वरदान कुशरा त्रिपायती शिवा भजे ऐसी शिवा है और वो श्री विद्या और श्री चक्र की अधिष्ठात्र है। श्री विद्या और श्री चक्र की अधष्ठात्री है। वही श्री विद्या है।
तो श्री चक्र क्या है?
श्री चक्र में भी त्रिकोण है। है ना? उस त्रिपुर के मध्य में विराजने वाली जो उस बिंदु पर स्थापित है जो उस बिंदु में विराजती है वो भी कैसे शिव कामेश्वरस्था शिवा स्वाधीन वल्लभा वो शिव के अंक में मतलब शिव के गोद में विद्यमान रहती है वही कामेश्वरी है ना वो कामेश्वर के अंक में विद्यमान रहती है और वो भिन्न रूप नहीं है वो शिवा का ही रूप है। वही शिवा है जो एक हो जाती है। मैंने एक आध बार और भी चर्चा की है कि शिव और शिवा दोनों एक है एकव शक्ति ये दोनों भिन्न शक्तियां नहीं है और त्रिपुर का निर्माण करने वाला भी भगवान शिव और उसको वरदान देने वाला भी भगवती तो ये दोनों ही इन्हीं के चाहने से होता है। इसीलिए ये जो है त्रिपुर सुंदरी है। इनके जैसा तीनों ब्रह्मांड में पूरे ब्रह्मांड में और स्वर्ग लोक मृत्यु लोक और पाताल लोक हम इनमें इनसे अधिक सुंदरी नहीं कोई है। इनको सुंदरी परा सुंदरी है। परा विद्या है। हम इनके सुंदरता में पूरे ब्रह्मांड की सुंदरता समाहित है। यह जब प्रसन्न होती है तो जगत को शांति देती है। जगत को जो भी चीजों की आवश्यकता होती है जो इनके कल्याण हेतु है ऐसे धर्म की उत्पत्ति करती है और इनको देती है। लेकिन जब ये क्रोधित होती हैं तो ऐसे दुष्ट जो है खंडासुर जैसे त्रिपुर जैसे इनका संघार भी करती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है।




