Sunday, March 15, 2026
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क्या टीईटी का प्रावधान नियुक्ति के समय लागू होना चाहिए या नहीं ?

टीईटी का प्रावधान नियुक्ति को लेकर संदीप जी ने बताया है कि यह एक सम्मान की लड़ाई है स्वाभिमान की लड़ाई है हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय का हम सम्मान करते हैं। लेकिन न्यायालय में एक न्याय की बात है। जब भी कोई निर्णय आता है, दोनों पक्षों को सुना जाता है। और यह जो निर्णय आया है, यह एक तरफ़ा है। किसी पक्ष को आमंत्रित नहीं किया गया इसको लागू करने से पहले। शिक्षक जो भी सरकारी नौकरी में है उन्होंने उच्च शैक्षिक डिग्रियां प्राप्त की है। फिर वो इस पद को प्राप्त किया हैं। चाहे उनकी शिक्षक पात्रता परीक्षा की बात करें हम जो नोडल एजेंसी जम्मू कश्मीर में या देश के किसी अन्य विभागों में जम्मू कश्मीर की बात करूंगा। एक जूनियर इंजीनियर को अपॉइंट करती है। एक अकाउंट असिस्टेंट को अपॉइंट करती है। एक क्लास फोर एंप्लई को अपॉइंट करती है। उसी ने इस टीचर को भी अपॉइंट किया। ये केवल एक शिक्षक के सम्मान की बात नहीं है। ये प्रश्न चिन्ह है उस सिलेक्शन एजेंसी पर भी। जो आज जिसको उसने जिस टीचर को आज से 10 साल 20 साल पहले उसने योग्य घोषित किया। आज ऐसे निर्णय से यह प्रश्न उस पर भी खड़ा होता है कि यह एलिजिबिलिटी वैलिड है या नहीं है। अगर एक शिक्षक की एलिजिबिलिटी वैलिड नहीं है तो किसी और की भी वैलिडिटी नहीं है। कोई भी अपॉइंटमेंट जो यहां उन सब पर ये प्रश्न चिन्ह है। तो फिर ऐसे एग्जाम हर किसी के लिए होने चाहिए।

शिक्षक किसी भी एग्जाम से नहीं डरता। हम वो लोग हैं जिन्होंने उच्च न्यायालय पर बैठे हुए लोगों को पढ़ाया और उस मुकाम तक पहुंचाया। हम उस समाज से वास्ता रखते हैं। हम किसी एग्जाम से नहीं डरते। लेकिन यह आपके स्वाभिमान पर एक चोट करता है। एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। यह न्याय की बात है। अगर ऐसी कोई भी घटना ऐसा कोई भी निर्णय जो किसी भी सरकारी कर्मचारी या प्राइवेट कर्मचारी के न्याय के सम्मान पर चोट करता है। उसके जीविका पर चोट करता है। उसको सहा नहीं जाएगा। उसके लिए आवाज उठेगी और जोर शोर से उठेगी। यह आवाज आज जम्मू कश्मीर की नहीं यह पूरे देश की आवाज है। चाहे पंजाब, दिल्ली जम्मूकश्मीर इत्यादि कहीं पर भी आप देखिए कहीं पर भी इस ऐसे निर्णय का स्वागत नहीं किया जा रहा है कि यह निर्णय एक तरफा है। आज पूरे देश में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई है। उन पर कोई निर्णय अभी तक नहीं आया है। तो सुप्रीम कोर्ट को माननीय न्यायालय को उसको दोबारा देखना पड़ेगा, संज्ञान लेना पड़ेगा और अपने इस निर्णय को विपरीत दिशा में फेरना पड़ेगा। तभी उसकी गरिमा का भी सम्मान होगा।

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